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अहरौरा मीरजापुर :-वोट की राजनीति पर स्थानीय मुद्दे हावी

*हरिकिशन अग्रहरि की रिपोर्ट*
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अहरौरा – मीरजापुर ।आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर चाय पान की दुकानों पर शाम होते होते मीनी चौपाल सज जाती है। अलग अलग राजनीतिक दलों के कारिन्दें जुबानी तथ्यात्मक शतरंज की चालें चलने लगते हैं और आम जनता मदारी और जमुरे के खेल को गौर से देखती है। यही आजकल अहरौरा की शाम बयां करती है लेकिन आम जनता आज भी अपनी मूलभूत सुविधाओं को राजनीतिक पार्टियों के द्वंद्व में ढूंढती है पर खेला या वादों पर होता है या तो उनकी सुरक्षा को सामने रखकर खेला जाता है।अहरौरा नगरपालिका वार्ड क्षेत्रों में कुछ समस्याएं दशको पुरानी है जिसका अभी तक अधिकारियों ने समाधान करने का जज्बा नहीं दिखा पायें हैं जो हर चुनाव में राजनैतिक माहौल में गर्माया जाता है जैसे – गोला पाण्डेय जी, कटरा, बौलिया मुहल्ले के जमींनी विवाद का मुद्दा है जो पूर्व भाजपा एम एल सी वीणा पाण्डेय और सैकड़ों वर्षों से काबिज निवासियों के बीच में है। एक ओर यहाँ के निवासियों का कहना है कि मेरी जमींन है जिसपर निर्माण कराने का मेरा अधिकार है। इस जमींन की रजिस्ट्री भी है। नगरपालिका में दर्ज मकान नम्बर भी है। वोटर लिस्ट में नाम भी है। पानी का टैक्स नगरपालिका को देने की रसीद भी है।जबकि दूसरी ओर सूत्रों की मानें तो वीणा पाण्डेय का कहना है कि यह पूरी जमीन हमारे पूर्वजों की है जो किरायेदारी पर दी गई थी जिसमें रहा तो जा सकता है मगर कोई नया निर्माण मेरी स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता है। इसी का परिणाम है कि मुहल्ला बौलिया में पक्के पोखरे की सफाई कई वर्षों से नहीं हो पायी है जिसका जल दूषित है जिसमें से दुर्गंध निकलती है फिर भी यहां के रहवासी इसी में जीने को मजबूर हैं। जिसने भी इसको मुद्दा बना इंसाफ की लड़ाई लड़ने की कोशिश की उसे या तो राजनैतिक दबाव में या तो पारिवारिक सुरक्षा के लिए जुबां को बंद करना पड़ा है।
दूसरी बड़ी समस्या अहरौरा बांध के सामने पहाड़ी पर निवासियों की है जिनका पक्का कच्चा मकान उस पहाड़ पर निर्मित हो चुका है मगर नगर पालिका उन्हें मकान नम्बर नहीं देती क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह विवादित जंगल विभाग की जमीन है। सूत्रों की मानें तो पहले वनाधिकारियों ने लाभ लेकर इस क्षेत्र पर पक्के – कच्चे मकानों द्वारा कब्जा होने दिया था और दशकों बाद यहाँ के रहवासी आज भी उसी राजनैतिक मुहाने पर खड़े हैं जिनके हिस्से में वादों के अलावा कुछ नहीं है।
आने वाले समय में आगामी चुनाव को देखते हुए इस विवादित भूमि के रहवासी अधिकारीयों के सामने बड़े प्रश्न चिन्ह खड़े कर सकते हैं जिससे कारण स्थानीय समस्याओं से संबंधित मुद्दे अन्य व्यवहारिक मुद्दों पर हावी दिखते हैं।

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