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बगहा :-23 मार्च के दिन हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलने वाले महान स्वंतत्रता सेनानियों शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता:- मुख्य अतिथि डॉ. शकील अहमद मोईन

बगहा(24मार्च 2019)
बगहा नगर के डी एम एकेडमी स्कूल प्रागंण में ”बौद्धिक विकास मंच के तत्वाधान में शानिवार की शाम शहीद-ए -आज़म भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेकी शहादत दिवस के उपलक्ष्य में एक विचार गोष्ठी आयोजन किया गया।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार व शिक्षाविद् रविकेश मिश्र एवं संचालन प्रख्यात प्रवक्ता दीपक राही ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उर्दू के मशहूर शायर व राष्ट्रीय स्तर के मुशायरा संचालक डॉ. शकील अहमद मोईन एवं विशेष आमंत्रित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक मदन मोहन गुप्त,राजेश्वर सिंह, कहानीकार अब्दुल गफ़्फ़ार,प्रख्यात साहित्यकार सह अधिवक्ता अखिलेश्वर नाथ त्रिपाठी, रत्न लाल नाथानी, संजय तिवारी,सहित मंच के संस्थापक सह अध्यक्ष जनाब कय्यूम अंसारी, महासचिव चंद्रभूषण शांडिल्य ने संयुक्त दीप प्रज्वलन कर विचार कोष्ठी का शुभारंभ किया गया।वही
शहीद-ए -आज़म भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव जी की चित्र पर मालार्पण व पुष्प अर्पित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। विषय प्रवेश “शहीद भगत सिंह का बलिदान और वर्तमान परिवेश ” शहर के प्रसिद्ध कवि एवं अधिवक्ता अखिलेश्वर नाथ त्रिपाठी ने कराया।
कार्यक्रम की शुरुआत सयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित करने के बाद रूपेश पाठक और उनके सहयोगियों रमज़ान अली, अब्दुल रहमान मन्ना ने “मेरा रंग दे बसंती चोला ” के मधुर गायन से समां बांध दिया। विचार कोष्ठी में मुख्य अतिथि डॉ. शकील अहमद मोईन ने बताया कि भारत की आजादी के लिए आज ही के दिन 23 मार्च को हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलने वाले महान स्वंतत्रता सेनानियों शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। जब-जब आजादी की बात होगी। तब-तब इंकलाब का नारा देने वाले भारत माता के ये वीर सपूत याद किए जाते रहेंगे। 23 मार्च 1931 को ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया था। भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना भारत के इतिहास में दर्ज सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी (लाहौर षड्यंत्र केस)। इसके लिए तीनों को फांसी की सजा सुनाई थी। तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर ही फांसी दे दी गई। इस मामले में सुखदेव को भी दोषी माना गया था। सजा की तारीख 24 मार्च थी, लेकिन 1 दिन पहले ही फांसी दे गई थी। जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे, उन्होंने कई किताबें पढ़ीं थी। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह और उनके दोनों साथी सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई थी। फांसी पर जाने से पहले वे अंतिम खोवाइस पूछी गयी जिसमे उन्होंने कहा था कि लेनिन की जीवनी पढ़नी हैं।साफ मना कर दिया गया था।वही भगत सिंह ने लेनिन की किताब को उछालते हुए हँसते हँसते फांसी पर चढ़ने चले गये।उन्होंने आगे बताया कि यह दिन कल की होली से भी ज्यादा अहम हैं।रमजान से भी ज्यादा अहम हैं ईद से भी ज्यादा अहम हैं।भगत सिंह ने कहा कि धर्म को व्यक्तिगत रूप में रखो। उन्होंने यह कहा है। व्यक्तिगत आचरण में तुम धर्म को रख सकते हो। लेकिन समूह में औसर्वजनिक नही कर सकते हो। इससे परेशानी पैदा होगी।आज का दिन इंसानियत को मुकम्मल करने का दिन है।आज का दिन नफरतों को दूर करने का दिन हैं।आज का दिन उन आजादी के बांकुरों को उस उम्र में इस बेबाकी के साथ इतना बड़ा पैग़ाम दे गए।यह हमेशा हम सबके दिल रहेगे।सदैव याद रहेंगे। वही साहित्यकार सह अधिवक्ता अखिलेश्वर नाथ त्रिपाठी ने कहा कि यह देश उन वीरों की कर्मभूमि भी रही है, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस देश के लिए कार्य किए हैं। अपने वतन के लिए प्राणों की बलि देने से भी हमारे वीर कभी पीछे नहीं हटे हैं। देश को स्वतंत्र कराने के लिए देश के वीरों ने अपनी जान की आहुति तक दे दी।
भगत सिंह के यह आखिरी बोल सोए देशवासियों को जगाने का काम किया और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगे।आजादी के इस महानायक ने बताया कि जिंदगी भले ही छोटी हो। लेकिन उसमें बड़े काम किए जा सकते हैं। जो आपकों हमेशा के लिए अमर बना देता है।वही प्रख्यात साहित्यकार रविकेश मिश्र ने बताया कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव। इन तीनों ने अपने प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारों से भारत के नौजवानों में स्वतंत्रता के प्रति ऐसी दीवानगी पैदा कर दी कि अंग्रेज सरकार को डर लगने लगा था कि कहीं उन्हें यह देश छोड़ कर भागना न पड़ जाये।जेल में इन तीनों साथियों पर अत्याचार किए गए। लम्बी चली इनकी भूख-हड़ताल को तोडऩे के लिए अंग्रेजों ने अमानवीय यातनाएं दिये। लेकिन वे विफल रहे। छोटी आयु में ही देश पर जान कुर्बान करने वाले इन क्रांतिकारी शहीदों को शत्-शत् प्रणाम।वही कहानीकार अब्दुल गफ़्फ़ार ने बताया कि शहीद- ए – आज़म भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की शहादत दिवस के मौक़े पर “बौद्धिक विकास मंच” के बैनर तले आयोजित विचार कोष्ठी बहुत ही अच्छा रहा। इन्होंने ने भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को महान स्वतंत्रता सेनानी बताते हुये कहा कि भगत सिंह ने देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिये 23 साल की उम्र मे हसते हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया था।वही शहादत दिवस’ 23 मार्च को राष्ट्रीय शहीद दिवस के रुप मे मनाने व भगत सिंह की जीवनी को पाठ्यक्रम मे शामिल करने की मांग की। बगहा के बुद्धिजीवीयों /नागरिकों ने नम आँखों से और देशभक्ति से लबरेज़ अपना ख़िराजे अक़ीदत पेश करने की बात कही। वही ग़फ़्फ़ार साहब ने भगत सिंह अमर रहें के जोरदार नारे के बीच भगत सिंह के ‘अमर रहे।इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाये।वही “बौद्धिक विकास मंच” के संस्थापक/अध्यक्ष कय्यूम अंसारी ने बताया कि आजादी के अमर सेनानी वीर भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को शहीद दिवस पर शत-शत नमन। भारत माता के इन पराक्रमी सपूतों के त्याग, संघर्ष और आदर्श की कहानी इस देश को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।उन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों और कदमों से अंग्रेजी हकूमत की जड़े हिला दी थीं। असेंबली में बम फेंककर उन्होंने अंग्रेजी हकूमत में खौफ पैदा कर दिया था।वही महासचिव चंद्रभूषण शांडिल्य ने बताया कि अमर शहीदो को नमन करते हुए कहा कि भगत सिंह कहते थे, ‘बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ वे कहते थे, ‘प्रेमी पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं और देशभक्‍तों को अक्‍सर लोग पागल कहते हैं।’ उनका कहना था, ‘व्‍यक्तियों को कुचलकर भी आप उनके विचार नहीं मार सकते हैं।’
दिसंबर 1928 में भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को गोली मारी थी। असेंबली में बम फेंकने के बाद भी ये भागे नहीं थे, जिसके इन्हें फांसी पर लटका दिया गया। भगत सिंह ने जेल में करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे।उन्होंने आगे बताया कि भगतसिंह ने अपने अति संक्षिप्त जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, उनके बाद अब किसी के लिए संभव न होगी।’वही असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह द्वारा फेंके गए पर्चों में यह लिखा था। आदमी को मारा जा सकता है उसके विचार को नहीं। बड़े साम्राज्यों का पतन हो जाता है लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं और बहरे हो चुके लोगों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज जरूरी है।’इन महान सपूतो मेरा शत शत प्रणाम हैं।वही विशेष आमंत्रित मदन मोहन गुप्त ने भी संबोधन किया।तमाम गणमान्यों ने भी अपने पाने विचार रखे। तत्पश्चात तीनो अमर शहीदों की याद में दो मिनट का मौन धारण भी किया एवं उन्हें नमन किया गया।इस अवसर पर समाजसेवी दयाशंकर सिंह,शिक्षक नागेंद्र कुमार उपाध्याय, सुरेश सिंह,शैलेंद्र कुमार,तिरेन्द्र राम, संजय कुमार,राजेन्द्र कुमार सहित तमाम गणमान्य उपस्थित रहे।

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