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बहराइच :होली की महान पौराणिक एवम वैज्ञानिक परम्परा ।

रिपोर्ट अनूप मिश्रा ibn24x7news ब्यूरो चीफ बहराइच

सभी  देशवासियों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

होलिका दहन:– 20 मार्च बुधवार,वाराणसी के समयानुसार रात्रि 08.12 बजे के बाद होलिका दहन का मुहूर्त है।
** वाराणसी से पश्चिम, उत्तर,दक्षिण के प्रान्तों में यह समय रात्रि 9 बजे के बाद ही उपयुक्त होगा।
**रंगभरी होली पूरे देश मे 21 मार्च, 2019 गुरुवार को मनाई जाएगी।
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पौराणिक संदेश:-
******* मित्रों ! होली का पर्व हमें बुराई पर अच्छाई का सन्देश देता है। लाख मुसीबत आने पर भी ईश्वर निष्ठ व्यक्ति का कुछ भी अहित नहीं होता। प्रहलाद को जला कर मारने की इच्छा रखनेवाली होलिका स्वयं आग में जल कर मर गयी।
बाल न बाँका करि सके जो जग वैरी होय।
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**नव शाश्येष्टि पर्व:–
********** नयी फसल में गेहूं, जौ, चना आदि तैयार होते हैं। किसान इनकी बालियों को सर्व प्रथम यज्ञाग्नि को समर्पित करके तब इसे ग्रहण करते हैं। ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
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**वासंतिक उल्लास:–
*********** वसंत ऋतु में जब चारों ओर वृक्षों में नयी कोंपलें, आमों में बौर आते हैं
भौरें गुंजार करते हैं, कोयल कूकती है तब मानव ह्रदय में भी आनंद, उमंग, उल्लास का सागर हिलोरें मारने लगता है।
ऐसे में नर नारी जाति वंश, छोटे बड़े का भेद भुला कर सभी रंग अबीर गुलाल से होली खेलते हैं। गले मिलते हैं। सब भेद भाव मिट जाते हैं।
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कुंठित मनोवृत्ति का मनोवैज्ञानिक उपचार
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जिस तरह फोड़े का मवाद चीर कर डॉक्टर बाहर न निकालें तो जहर पूरे शरीर में फ़ैल कर जीवन के लिए ही खतरा बन सकता है। ठीकउसी प्रकार समाज की कठोर मर्यादा में बंधे नर नारियों की दमित काम भावना का निष्कासन भी जरुरी है। होली में मर्यादाओं के बंधन कुछ ढीले पड़ जाते हैं।
हँसी ठिठोली, छेड़ छाड़ से सब उन्मुक्त महसूस करते हैं इसीलिए एक कहावत है–
“भर फागुन बुढवा देवर लागे ”
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वैज्ञानिकता:—***शीत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु की संधिवेला है वसंत ऋतु। इसके बाद गर्मी बढ़ने लगती है।
गर्मी आने पर लोग पसीने से बेहाल हो जाते हैं।
फोड़ा,फुंसी, दाद,खाज, खुजली आदि चर्म रोगों से लोग परेशान हो जाते हैं।
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इनसे बचाव के लिए कुछ कृत्य होली की धार्मिक परंपरा में जोड़ दिए गए।
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जिस तरह देव मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा में मूर्ति के दस स्नान का विधान है उसी प्रकार का विधान होली खेलने के बहाने जोड़ दिया गया। ताकि जन जन को ग्रीष्म ऋतु में रोगों से मुक्ति मिले।
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विधिवत होलिका दहन कर वहीँ होली गाई जाती थी। तथा नए अन्न को उसमें होम किया जाता था।

पुराने जमाने में जब माचिस का चलन नहीं था तो होली की अग्नि को घर ले जाते थे और माताएं बहने सालों भर उस अग्नि को सुरक्षित रखती थीं।

अगले दिन प्रातः होली खेलने की शुरुआत होली के भस्म से की जाती थी।

भस्म के बाद गाय का गोबर, गोमूत्र, मिटटी आदि खेल खेल में एक दूसरे को लगाने का क्रम दोपहर तक चलता है।ये सब पदार्थ औषधीय गुण रखते हैं। इनसे चर्म रोगों से रक्षा होती थी।

-**तत्पश्चात अच्छी तरह स्नान कर कपड़े बदल कर रंग अबीर खेलते हैं।
ये रंग भी प्राकृतिक फूलों टेसू, मेंहदी आदि से तैयार होते थे।
इनमें भी औषधीय गुण होते थे।
** रंग गुलाल खेलते हुए, होली के गीत गाते हुए मण्डलियाँ घर घर जाती थीं।
हर घर में गुझिया,, नमकीन, मिठाई आदि से स्वागत होता था।
इस तरह होली एक सामाजिक समरसता का भी त्यौहार है।
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आज हम होली में क्या कर रहे हैं ???
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आज भस्म, मिटटी, गोबर की जगह नाली की कीचड़ से लोग होली खेल रहे हैं।

प्राकृतिक रंगों की जगह रासायनिक रंग और पेंट से हम एक दूसरे का थोबड़ा बिगाड़ने में ही शान समझते हैं।

होली मनाने के नाम पर लाखों करोड़ों जानवरों,, पक्षियों को मारकर खा रहे हैं।

शराब पीकर नालियों में लोट कर, उल्टियाँ करके होली मना रहे हैं।

मीठी बोली,, हँसी ठिठोली की जगह गन्दी गन्दी गालियाँ और भद्दे भद्दे अश्लील गीत गाकर अपनी निर्लज्जता का प्रदर्शन कर अपने धर्म का स्वयं उपहास कर रहे हैं और फिर ये कहते भी नहीं थकते कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।
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आइये इस होली में हम सचमुच सही तरीके से होली मनाएँ।
होली की ऋषि परम्परा का पालन करें
स्वयं और दूसरों के जीवन में इस होली पर्व पर खुशियों का सन्देश दें।
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एक बार फिर से होली की हार्दिक शुभकामनाएँ 🍧 ibn24x7news

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