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बहराइच : 161वें बलिदान दिवस पर याद किये गये चहलारी नरेश बलभद्र सिंह


कैसरगंज।13 जून 1858 को 1857 की क्रांति के बलिदानी चहलारी नरेश बलभद्र सिंह ने इस धारणा को पलट कर रख दिया था कि ‘ कोऊ नृप होय हमै का हानी।’लोक प्रचलित भावना इस देश के विषय में बहुत लंबे समय से चली आ रही थी कि तुर्कों और मुगलों के आक्रमणों के समय भारतीय स्थानीय शासक पूरी तरह उदासीन रहे लेकिन बलभद्र सिंह के बलिदान ने यह सिद्ध कर दिया कि अवध की सत्ता भले ही वाजिद अली शाह के हाथ में रही हो परंतु मातृभूमि की रक्षा सबसे ऊपर है। अवध के शिया नवाब वाजिद अली शाह की अंग्रेजों के हाथ पराजय के बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी उनकी बेगम हजरत महल के हाथ में आ गयी थी।उन्होंने अवध की सेना का नेतृत्व करने के लिए पुत्र का संबोधन करके बलभद्र सिंह को निमंत्रित किया था। माँ का आदेश मानकर मात्र 18 साल के तरुण बलभद्र सिंह ने अवध की सेना का नेतृत्व करते हुए13 जून 1858 को रेठ नदी के तट पर नवाबगंज(बाराबंकी)वीरगति प्राप्त की।इस अमर बलिदानी का साझा संस्कृति का वह संदेश आज भी बहराइच के लोगों को प्रेरणा देता है।
चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह केत्र161 वें बलिदान दिवस पर किसान पी.जी.कालेज,बहराइच के मध्यकालीन इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर डा.सत्यभूषण सिंह के गुथिया-कैसरगंज स्थित आवास ‘ वेणुकुंज ‘ में एक श्रद्धांजलि का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें लोगों ने बलभद्रसिंह के बलिदान को याद करते हुए उनके चित्र पर माल्यार्पण किया।इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महेन्द्र प्रताप सिंह ने की। इस अवसर पर अभिषेक सिंह सूरज,अधिवक्ता उच्च न्यायालय,हारून रशीद एडवोकेट,त्रषभ सिंह ब्लाक कोआर्डिनेटर नेहरू युवा केंद्र,अनिल कुमार वर्मा युवा समाजसेवी,डा.योगेश प्रताप सिंह,विष्णुप्रताप सिंह,देवाशीष सिंह,अभय सिंह,शुभेन्द्र सिंह सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

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