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नागरिकता संशोधन कानून: कौआ कान ले गया

 

नागरिकता संशोधन कानून की उचित जानकारी के अभाव में  दिग्भ्रमित भारतीय नागरिक अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए  हिंसक प्रदर्शनों के मकड़जाल में उलझ कर सही गलत का अंतर भूल गया है । वरिष्ठ दलों कांग्रेस और TMC, द्वारा नागरिकता कानून को मुस्लिम विरोधी, दलित विरोधी व संविधान विरोधी घोषित करने की कुतर्क और कुटिल चाल चली जा रही है। कुतर्क ये है कि ये कानून देश में अवैध रूप से रह रहे छह धर्मों के लोगों को तो शरणार्थी मानकर नागरिकता देने की बात करता है लेकिन अवैध रूप से रोहिंग्या बांग्लादेशी मुस्लिमों को घुसपैठिया बताता  है।

प्रदर्शनकारियों को दिग्भ्रमित भी किया गया है कि इस कानून से उनकी भारतीय नागरिकता छिन जाएगी। ये भ्रमित प्रदर्शनकारी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि और दुष्प्रचार-तंत्र का माध्यम बनते जा रहे हैं। मोदी सरकार में गरीब व अल्पसंख्यक समाज को अधिकांश योजनाओं मुद्रा योजना, उज्जवला योजना, और सम्मान निधि आदि का भरपूर फायदा इसलिए मिला क्योंकि सरकारी तंत्र अपना काम सही तरीके से कर पाया नहीं तो भारत को आज़ाद हुए तो सत्तर साल से ज्यादा हो गए हैं।  अल्पसंख्यक समाज गरीबी और अशिक्षा के कारण दुस्प्रचारों और स्वार्थसिद्धि का सरल संसाधन बना हुआ है।

जो मुसलमान पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के नागरिक हैं और धार्मिक उत्पीड़न के शिकार भी नहीं हैं, उन्हें ये प्रदर्शकारी क्यों नागरिकता कानून में शामिल करना चाहता है। जिस देश में अतिथि देवो भव् कहा जाता है और जहाँ सभी समुदायों के मुसलामानों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गयी है, उसी देश में केवल वोट के लिए रोहिंग्या मुसलामानों को देश का नागरिक बनाने के लिए हमारे भारतीय मुस्लिमों को अपनी नागरिकता छिनने  का डर दिख रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि पूर्वोत्तर भारत की चिंताओं का सबसे बड़ा कारण बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए या फिर रोहिंग्या घुसपैठिए ही रहे हैं।

इन्होंने जो घुसपैठ की है, वह भी किसी धार्मिक प्रताड़ना या विवशता के आधार पर नहीं, बल्कि मौजूदा अवसरों और संभावनाओं को हड़पने के लिए स्वेच्छा से की है। विपक्ष ये विरोधाभासी तर्क फैला कर राजनीतिक लाभ लेना चाह रहा है। जनता को समझना होगा कि बहुमत वाली जनतांत्रिक सरकार को अस्थिर करने के लिए विपक्ष लोगों को उकसा रहा है।

भारत विभाजन के लिए 96% से भी ज्यादा भारतीय मुसलमानों ने मुस्लिम लीग के पक्ष में वोट किया था… और लगभग 87% सीटें मुस्लिम लीग ने जीती थी। बादशाह खान के नेतृत्व वाली NWFP ने उस समय भारत का साथ दिया था, लेकिन बाद में NWFP (Khyber Pakhtunkhwa) के  नेताओं ने भी रिफ्रेंडम में पाकिस्तान का साथ दिया। इस प्रकार संपूर्ण भारत के मात्र 4% मुसलमानों ने ईमानदारी से भारत के लिए वोट किया। लेकिन दुर्भाग्यवश इस विभाजन के बाद लगभग 90% मुसलमान हिंदुस्तान से पाकिस्तान में नहीं गए, भारत ही रह गए क्यों? विश्वासघात का स्तर यह था कि मुस्लिम लीग के सबसे बड़े नेताओं में से एक नवाब इस्माइल खान, जिन्होंने financially, politically और physically मुस्लिम लीग का समर्थन किया था, पाकिस्तान जाने से ही मना कर दिया था। विभाजन के बाद इस व्यक्ति ने फिर से IUML नाम से पार्टी बनाई और स्पष्ट रूप से कहा- “The creation of Pakistan is beneficial not only to Muslims of Pakistan, it is also beneficial to Muslims of India… The Muslims of India are proud of having achieved Pakistan. A Muslim is always a Muslim. A Muslim first and a Muslim last.”

【Ref: The Political Evolution of Muslims in Tamilnadu and Madras, 1930-1947】

बार बार पाकिस्तान का समर्थन करने से या कट्टर अल्पसंख्यकों को भारत मे पनाह देने का समर्थन करने से भारतीय मुसलमान अपनी वैधानिकता को स्वयं ही चुनौती देने लगे हैं। यही कारण है उन्हें लगता कि वो अपनी पहचान ही खो देंगे अगर हिंदुओं की संख्या बढ़ जाएगी।

क्या मुगल शासन मे हिंदुओं ने अपनी धार्मिक व सामाजिक पहचान खो दी थी या हम इतने असहिष्णु हैं कि मुसलमान सैकडों सालों से साथ रहने के बाद भी हमें अश्पृश्य समझे। कट्टरता दोनो ही तरफ की, दोनों समुदायों के विनाश के लिए जिम्मेदार होगी। हम फिर से किसी बाहरी शक्ति के अधीन हो कर अपनी स्वतंत्र नहीं खो सकते। अपने बच्चों के लिए ही सही हमें ऐसे सामाजिक, आर्थिक और जनतांत्रिक राष्ट्र की परिकल्पना करनी होगी जहां हम मजलूम और सताये हुऐ को तो पनाह दें लेकिन शरणार्थियों और घुसपैठियों मे अंतर समझ सकें।

ध्यान रहे प्रधानमंत्री ने नागरिकता कानून  को नागरिकता छीनने वाला नहीं बल्कि नागरिकता देने वाला कानून बताया है।  हमें सत्य से परिचित होना होगा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के अल्पसंख्यक जान बचा कर भारत आये तो उन्हें मानवीय सम्मान देने के लिए गाँधी जी की इच्छानुसार नागरिकता कानून में संशोधन किया गया है। भारतीय नागरिक जो यहाँ पैदा हुआ है, उसके पैतृक, सामाजिक, लोकतान्त्रिक और धार्मिक अधिकारों पर ये संशोधन कोई सवाल या खतरा नहीं पैदा करता है। कहावत है कौआ कान ले गया, तो पहले कान को देखिये कौए के पीछे भागने से समय ही बर्बाद होगा।

इन प्रायोजित विरोधों को ध्यान में रखते हुए सरकार की ओर से लगातार यह स्पष्ट किया जा रहा है कि ‘देश की जनता को इन षडयंत्रों को समझना होगा और ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ और ‘नागरिकता संशोधन कानून-2019’ जैसे अनिवार्य और भारत हितकारी कानूनों के संबंध में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार और अफवाहों से दूर रहना होगा। क्या भारतीय लोकतंत्र इतना सहिष्णु होना चाहिए कि इसमें साहिष्णुता और मानवीय दृश्टिकोण की कोई सीमा ही परिभाषित न हो? नागरिकों को अपनी सीमाएं समझनी होगी।

 

Dr Ritu Srivastava IBN24X7NEWS

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