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भारत में लोकतंत्र सफल है या विफल ?

रिपोर्ट अरविंद यादव ibn24x7news महाराजगंज

भारत भले ही दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता हो पर राष्ट्र के तौर पर काफी युवा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है। भारत में लोकतंत्र तब आया जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। यह संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। भारत में लोकतंत्र को एक मशीन की तरह आसानी से चलना चाहिए लेकिन कुछ हानिकारक तत्व इस काम में बाधा डालते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि भारत के संवैधानिक लक्ष्य और लोकतांत्रिक आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाती भारत के संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने, सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का वादा सिर्फ एक वादा ही है।

अनपढ़ भारतीयों की विशाल संख्या अक्सर भय और गलत बयानी का शिकार हो जाती है। राजनीतिक रुप से असंवेदनशील लोकतांत्रिक सिद्धांत और विचार उनके लिए ग्रीक या हीब्रू की तरह हैं। निरक्षरता असमानता का एक मुख्य कारण है। हमारे यहां पूंजीवादी लोकतंत्र है जहां अमीर आदमी गरीब का शोषण करता है। इसके अलावा भारत में कई भाषाएं और कई धर्म हैं। इसके परिणाम स्वरुप दुर्भाग्य से सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और कट्टरवाद पनपा और असहिष्णुता की प्रवृत्ति विकसित हुई।

जातिवाद अब अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसलिए आज भी ये खबरें आती हैं कि किसी दलित को सार्वजनिक स्थान पर या मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई।भारतीय राजनीति बहुदलीय प्रणाली है। लेकिन राजनीति मौकापरस्ती और भ्रष्टाचार का खेल बनकर रह गई है। समाज की हर परत में भ्रष्टाचार व्याप्त है। बंद, हड़ताल और आतंकवादी गतिविधियों ने लोकतांत्रिक आदर्शों पर गहरा आघात किया है।

अब्राहम लिंकन ने कहा था कि लोकतंत्र लोगों के लिए, लोगों के द्वारा और लोगों का है। किसी लोकतंात्रिक देश में कानून लोगों के द्वारा ही बनाए जाते हैं। इस पहलू में भारत को आसानी से सबसे कम न्याययुक्त देश कहा जा सकता है। यहां अमीर लोगों के पैसों की ताकत के आधार पर कानून बेेचा और खरीदा जाता है। संवैधानिक कानून विशेषज्ञ जाॅन पी फ्रेंक के अनुसार, किसी भी परिस्थिति में राष्ट्र को अपने नागरिकों पर अतिरिक्त असमानता नहीं थोपना चाहिए। उसे अपने हर नागरिक के साथ समान रुप से व्यवहार करना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में ऐसी कोई स्थिति नहीं है। एक सामान्य सा संवैधानिक अधिकार जैसे ‘सूचना का अधिकार’ भी इस देश में तमाशा ही है।

अब तक उपर दिए गए छोटे से विश्लेषण से ही पता चलता है कि जो स्थितियां लोकतंत्र को किसी भी देश में सफल बनाती हैं वे इस देश में गौण हैं। लेकिन साम्राज्यवाद के खिलाफ एक लंबे संघर्ष के कारण साम्राज्यवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी और सत्तावाद विरोधी नजरिया भारत में विकसित हुआ है। जनता इस बात को लेकर जागरुक हो गई है कि लोकतंत्र ही उनके लिए एक मात्र विकल्प है। साम्यवाद भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में असफल हो चुका है और वह तो स्वर्ग में भी काम नहीं करेगा।

पिछले कुछ दशकों में संसदीय लोकतंत्र की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि भारत संवैधानिक नैतिकता के पतन को रोकने के लिए तत्पर है। यह सब प्रक्रियाएं निश्चित रुप से भारत को वह लोकतंत्र बना रही हैं जो सिर्फ नाम का नहीं है बल्कि उसमें आत्मा भी है।

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