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राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रद्रोह अजीब विड़म्बना है मेरे देश की.. यहां इशरत ‘बेटी’ है, कन्हैया ‘बेटा’ है, दाऊद ‘भाई’ है और अफज़ल ‘गुरु’ है। लेकिन बस मोदी “चोर” है

राष्ट्रभक्त कौन और राष्ट्रद्रोही कौन? विचारों के मतभेद राष्ट्र से ऊपर नहीं हो सकते हैं।टुकड़े टुकड़े गैंग ले के रहेंगे आज़ादी, स्वयं मे ही विरोधाभासी दृष्टिकोण लिए हुए हैं। ले के रहेंगे आज़ादी जो कि जेएनयू का प्रसिद्ध नारा है ये उद्द्घोषित नहीं करता कि उन्हें किससे आज़ादी चाहिये। कसाब जो दुनिया और भारत के लिए आतंकवादी था, वही कसाब इनके लिए राष्ट्रभक्त कैसे? अफजल तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, ये किसी छात्र की अभिव्यक्ति कैसे हो सकती है। हम सब अपनी अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी तरक्की के लिए देशभक्ति को नित नए ढंग से परिभाषित करते हैं लेकिन हम भूल जाते हैं कि राष्ट्रभक्ति कोई कानून नहीं, कोई भावना नहीं बल्कि धर्म है जिसमें सिर्फ और सिर्फ संकल्प और आध्यामिकता से ही सिद्धि को प्राप्त किया जा सकता है।

राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रद्रोह अजीब विड़म्बना है मेरे देश की.. यहां इशरत ‘बेटी’ है, कन्हैया ‘बेटा’ है, दाऊद ‘भाई’ है और अफज़ल ‘गुरु’ है। लेकिन बस मोदी “चोर” है। .

सुख दुख कोई नहीं देता है। यदि हम सुखी रहना चाहते हैं तो कोई हमें दुःखी नही कर सकता। ये जिंदगी की मूल भावना है उसी तरह जिस तरह देशभक्ति। हम अपना अपना दृष्टिकोण अपने अनुभव के आधार पर बनाते हैं। हम सही हैं तो ये कतई सिद्ध नहीं होता कि सामने वाला गलत है वो वैचारिक मतभेद हो सकता है लेकिन राष्ट्रधर्म पर तो वैचारिक क्या सैद्धान्तिक मतभेद भी संम्भव नही। हिंसक होना किसी भी समस्या का हल नही। क्या जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के विवेकी और संयमी छात्र देशभक्ति की नई परिभाषा का सृजन कर रहे हैं।

जहां बाकी भारतीय विश्वविद्यालय अपना सारा ध्यान अपनी उत्कृष्टता को बढ़ाने में प्रयासरत हैं वहीं उपरोक्त विश्वविद्यालय केवल फीस बढ़ोतरी, कसाब, अफजल और नागरिकता संसोधन कानून का विरोध करने में अपनी ऊर्जा का प्रयोग करता है। आखिर JNU प्रशासन और सरकार इतनी निरीह और अकर्मण्य क्यो है कि कोई भी राष्ट्रभक्ति के नाम पर कानून अपने हाथ मे लेकर मनमानी करे? रूरल नक्सलवाद और वामपंथी विचारधारा का ऐसा गठबंधन राष्ट्र के लिए ही नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा के लिए भी घातक है।

 

देश के सामने आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर मुँह बाए खड़ी दुहरी चुनौतियों से लड़ने की बजाय सरकार जनता का पैसा और अपना टाइम दोनों ही इन दिग्भ्रमितों ? को सही राह पर लाने के लिए व्यर्थ कर रही है। सबका साथ सबका विकास औऱ सबका विश्वास के मूलमंत्र के प्रति उन उन तत्वों का विरोध प्रकट करना स्वाभाविक है जो देश हित में होने वाले परिवर्तन को अपने स्वार्थ परक राजनीति पर कुठाराघात मान रहे हैं। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष का विरोध होना स्वाभाविक और हितकर है, पर जब विरोध के नाम पर देश में अराजकता और सार्वजनिक संपत्ति को जलाने की बात की जाए तो यह राष्ट्रघाती नकारात्मकता का द्योतक है।

अमेरिकी हमले में ईरान के सबसे ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान में देशभक्ति दो विचारधारा में नहीं बांटी लेकिन मुंबई हमले और कश्मीर में आतंकवाद पर हमारा राष्ट्र धर्म वैचारिक व सैद्धान्तिक मतभेद का शिकार हो गया। महान वैज्ञानिक सर आइज़क न्यूटन जब मृत्यु शैया पर थे, तो उनके मित्रों ने उनसे पूछा कि वह अपने जीवन की संपूर्ण यात्रा को किस रूप में देखते हैं?

उन्होंने कहा मैं यह तो नहीं जानता कि मेरी बातों को दुनिया किस रूप में सोचती है लेकिन हकीकत तो यही है कि मैं जीवन भर एक छोटे बच्चे की तरह किसी समुद्र तट पर कंकड़ पत्थर ही चुनता रहा जबकि सत्य का अगाध सागर बिना किसी खोज के मेरी नजरों के सामने बेकार ही पड़ा रहा। इस वक्तव्य का तात्पर्य है कि जेएनयू के दिग्भ्रमित छात्र गंभीरता से खुद के अंदर झांकने की कोशिश करें| अंत में एक बात तो क्या उन्हें ऐसा प्रतीत नहीं होगा कि उनके अंदर भी एक देशभक्त भगत सिंह छुप कर बैठा हुआ है जो ज्ञान और सत्य के अच्छा सागर के किनारे बैठ कर भ्रम वश कंकड़ और पत्थर चुनकर अपना जीवन समाप्त कर रहें हैं।

सहसा उसे यह आत्मज्ञान होता है कि इन कंकड़ पत्थर का मूल्य तो कुछ भी नहीं था लेकिन जो राष्ट्रद्रोह मैंने किया उसका प्रायश्चित क्या होगा? क्या आज इस प्रश्न का उत्तर देना अनिवार्य नहीं है कि आखिर जेएनयू शिक्षा के चरम की अपेक्षा में अपने वर्तमान को क्यों कलंकित कर रहा है। विचारधारा के स्तर पर असहमति खत्म नहीं हो सकती लेकिन यह दुश्मनी में बदले तो इसका कोई उपाय नहीं। इसलिए ऐसे लोग जो किसी राजनैतिक विचारधारा से नहीं जुड़े हैं, जेएनयू प्रशासन, छात्र संगठन व शिक्षक संगठन सभी से बातचीत करें और संवाद स्थापित करें कि वैचारिक मतभेद को राष्ट्रभक्ति ना समझें।

 

कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार का संकट बढ़ाने पर आमादा देश विरोधी ताकतों ने जेएनयू में उत्पात मचाने की साज़िश तो नहीं बनाई ? बेहतर हो सरकार हर संभव प्रयास करें कि जेएनयू में हिंसा और उत्पात फैलाने वालों का सच जल्द सामने आए। आवश्यक यह भी है कि उन सैद्धान्तिक कारणों का निवारण किया जाए जिसके चलते जेएनयू और जामिया तथा अलीगढ़ विश्वविद्यालय अपनी विचारधारा से इतर अराजक शैक्षिक शिक्षण संस्थान के तौर पर कुख्यात हो रहें हैं और जिन उद्देश्यों से इस शिक्षण संस्थान की स्थापना हुई थी उनसे वह दूर जा रहा है।

 

Dr. ऋतु श्रीवास्तव @IBN24X7NEWS

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