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पश्चिमी चम्पारण – बेलवा “3 किलोमीटर का सड़क 30 साल में सर्वे पुरा नहीं

Ibn24x7news रिपोर्ट विजय कुमार शर्मा पश्चिमी चंपारण बिहार
*शिवहर-* जिला तथा मोतिहारी जिला के संपर्क लाइन बेलवा घाट पर मात्र 3 किलोमीटर का सड़क बनने को लेकर सर्वे सूचि 30 सालों में पूरा नहीं हो सका है। जिस कारण जिला शिवहर एवं मोतीहारी से संपर्क में 3 किलोमीटर की बाधा पिछले 30 वर्षों से ज्यो का त्यों बना हुआ है। और ऊपर से जिला पदाधिकारी के न्यायालय में 11 रैयतों के द्वारा दायर मामले को फैसला ना होने के कारण बेलवा सड़क बनना अधर में लटका पड़ा हुआ है। गौरतलब हो कि शिवहर जिले के सबसे बड़ी समस्या बेलवा घाट है जहा बागमती नदी ने अपनी धारा का रुख 1985 में बेलवा बांध के तटबंओ को ध्वस्त करते हुए नदी की धारा परिवर्तित हुआ था ।
बागमती नदी के रुख बदलने के कारण बेलवा गांव, नरकटिया गांव ,इनरवा गांव के तकरीबन एक सौ से अधिक किसानों का निजी जमीन बागमती नदी के पेटी में चला गया है । जबकि खाता संख्या 238, 427 के लगान शुल्क पर रोक है जिसमें रैयती जमीन भी उसी जमाबंदी में है जो कि भू अर्जन के अधीन आता है।
मौजूदा समय में इंदरवा से बेलवा घाट होते हुए देवापुर मोतिहारी सड़क जो जाती है वह बेलवा ,नरकटिया ,इनरवा, देवापुर के किसानों के व्यक्तिगत जमीन पर आवागमन चालू है।
सरकार कितने आए और गए ,मौजूदा समय में बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार के तालमेल के बावजूद भी शिवहर जिले मोतिहारी जिले के सबसे बड़ी समस्या बेलवा मात्र 3 किलोमीटर का रासता को 1985 के बाद से अब तक किसी भी सरकार ने सड़क बनाने कि हिम्मत नहीं दिखाया है।
बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार के नजरअंदाज के बावजूद भी वहां के किसानों ने अपनी जमीन पर ही पिछले 30 वर्षों से राहगीरों को आने जाने के लिए रास्ता दे रखा है।अगर चाहे तो वहां के किसान अभी भी किसी भी राहगीरों को अपने जमीन से ना आने जाने दे तो क्या हाल होगा इस मौजूदा समय में….?
बागमती नदी में जब अपना रुख बदला था उससे पूर्व ,पूर्व केंद्रीय मंत्री हरि किशोर सिंह एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुनाथ झा के अथक प्रयास से बेलवा नदी पर पुल डिपार्टमेंट के द्वारा चार पाया तकरीबन 3 एकड़ जमीन भू अर्जन कर 4 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाने लगा था इसी बीच नदी की धारा बदलने के कारण काम रुक गया तथा उससे पैसा का अबतक अता पता नहीं है कौन कंपनी कहां है, क्या कर रहा है, और यह पैसा कहां गया कोई खोजने पूछने वाला भी नहीं है।
हालांकि नया सर्वे 1962 में किया गया था उसके बाद 1975 के बांध बांधने के समय पुण: सर्वे किया गया तब बांध बनाया गया उसके बाद 1985 में भयंकर बाढ आने के कारण बागमती नदी ने अपनी धारा को रुख बदलते हुए दक्षिण दिशा में तकरीबन 400 मीटर बांध को तोड़ दिया ।
1987 बाढ़ आने के बाद एसट्ऐक्चर का काम पहली बार सर्वे के साथ प्रारंभ हुआ बांध बन गया सिर्फ स्ट्रक्चर का 200 मीटर पुराना बांध का एलाइनमेंट पर काम होना था,इस बीच में पानी आया जो खाली जगह था उसको तोड़ते हुए लगभग 200 मीटर गया था वह बढ़कर 3 किलोमीटर हो गया।
वर्ष 2016 में जल संसाधन विभाग के द्वारा हिंदुस्तान स्टील कंस्ट्रक्शन लिमिटेड भारत सरकार के उपक्रम के तहत अवंतिका कंपनी के द्वारा 96 करोड रुपए से जमीन पर बांध, रेगुलेटर, मुआवजा को रिभाइज में भेजा गया था। जिस पर 400 मीटर ऑफ रेगुलेटर बन रहा है 120 मीटर लंबा 56 मीटर चौड़ा डाउनलोड लगभग 12 मीटर कार्य प्रारंभ किया गया परंतु ग्रामीणों ने बताया है कि डैम का निर्माण 2016 में ही शुरू किया गया था लेकिन भू-अर्जन 2017 में हुआ है 1 एकड़ 62 डिसमिल जमीन जिस पर डैम का निर्माण आधा अधूरा चल रहा है।
परंतु वर्ष 2016 से ही अब तक मात्र 15 से 20 फ़ीसदी ही रेगुलेटर का काम किया जा चुका है काम काम होने के कारण भू अर्जन की प्रक्रिया समय से पूरा नहीं होना कनीय अभियंता राकेश कुमार ने बताया है।
जबकि 11 रैयतों पूर्व मुखिया राजकिशोर पांडे, चंद किशोर पांडे, सतनारायण चौधरी, राकेश चौधरी, सूर्या वती देवी, विनीता चौधरी, राम पदार्थ चौधरी, शीतल चौधरी ,सुमेश्वर चौधरी ,बैजनाथ चौधरी ने जमाबंदी रद्दीकरण को लेकर जिलाधिकारी के न्यायालय में मामला दायर किया है जहां मामला विचाराधीन है।
जल संसाधन विभाग के कनीय अभियंता राकेश कुमार बागमती परियोजना के कार्यपालक अभियंता राजेंद्र प्रसाद के अनुसार 65 किसानों को भूमि अधिग्रहण को लेकर सूची तैयार कर नोटिस भेजा गया है।
स्थानीय ग्रामीणों ने मांग की थी कि नदी का रुख बदल गया है उसके फिर से पुराने जगह पर लाने के बाद ही जिस जगह में पूर्व में बांध था वहीं पर बांध बनाया जाए लेकिन नदी के रुख बदल जाने के कारण ऐसा संभव नहीं था ,फिर नदी के बहाव को देखते हुए विभाग द्वारा नए एलाइनमेंट बनाकर बांध बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई जिससे स्थानीय ग्रामीणों के द्वारा रोक दिया गया वह स्थिति आज तक है।
लेकिन कितने सरकार बदल गए, कितने प्रशासन आए और चले गए, कितने मंत्री,सांसद ,विधायक रास्ते से गुजर रहे हैं परंतु बेलवा घाट की समस्या को निदान करने तथा वहां के स्थानीय ग्रामीणों को समस्या को सुनने वाला दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है।
पूर्व मुखिया राज किशोर पांडे ने कहां है कि बेलवा घाट के लिए एक जन आंदोलन की जरूरत पड़ रही है ताकि जिला प्रशासन से लेकर बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार तक बेलवा सड़क की समस्या के निदान के लिए आंदोलन किया जाएगा। स्थानीय लोगों ने बताया है कि जब-जब बागमती नदी की धारा बहती है तो कम से कम एक दर्जन गांवों में हज़ारों लोग प्रभावित होते हैं लेकिन प्रशासन, मंत्री, सांसद, विधायक आकर निरीक्षण करते हैं तथा यहां आकर फोटो सेल्फी लेते हैं पर समस्याओं का निदान नहीं कर पाते हैं।

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