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अरविंद केजरीवाल का जादू एक बार फिर दिल्ली वालों के सर चढ़कर बोला

 

दिल्ली विजय पर आम आदमी को ढेर सारी शुभकामनाएँ। अरविंद केजरीवाल का जादू एक बार फिर दिल्ली वालों के सर चढ़कर बोल रहा है। 70 में से 62 सीटों पर जीत दर्ज करा पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। ये विजय पार्टी द्वारा किये लोकलुभावन कार्यों और मध्यम वर्ग को दी गई सौगातों का सुखद परिणाम है। लोक हित में किये गए वादों के कारण ही बीजेपी इस चुनावी घमासान में सांत्वना की हकदार रही क्योंकि वो आम आदमी पार्टी का वोट शेयर कम करने में सफल रही। ये मौजूदा सरकार द्वारा पिछले पांच सालों में लगाई गई फसल के उचित दाम मिलने जैसा है।

दिल्ली में मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा व्यवस्था में किये गए सुधारों, स्वास्थ के  लिए मोहल्ला क्लिनिक, बिजली व्यवस्था में परिवर्तन, महिलाओं की मुफ्त यात्रा और वृद्धों की तीर्थंयात्रा जैसे कार्यों का ही फल है कि दिल्ली ने आम आदमी पार्टी को फिर ये अवसर उपलब्ध कराया है। केजरीउवाच सत्य है, लेकिन सत्य नही भी है कि

“हे दिल्ली के नागरिक

चल लाइन लग

केजरीवाल को वोट दे।

फिर तू घर जा

और आराम से सो जा।

मुफ्त पानी पी

मुफ्त बल्ब जला, 

बस की यात्रा कर

मुफ्तखोरी का अपना कर्म

पूरी मेहनत और लगन से निभा।”

2015 में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं के बल पर ही सत्ता में आई थी। कांग्रेस क्या इस बुनियादी बात से अनभिज्ञ हो सकती कि मतदाता चुनाव पूर्व ही अपना मन बना लेते हैं। समझना कठिन है कि कांग्रेस दिल्ली में चुनाव लड़ने से पूर्व ही गँवाने की खाना पूर्ति करती क्यों दिख रही है?

कांग्रेस के रुख को देखते हुए  क्या ये कहना उचित नहीं कि वो परोक्ष रूप से केजरीवाल को दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में देख रही है। 

चुनाव जीतने के महारथी भी सत्तारुढ़ दलों द्वारा जनता को दी गयी सुविधाओं को नकार नहीं सकते।  राष्ट्रीय पार्टियाँ किसी की राष्ट्र भक्ति को चुनौती दे कर, शाहीन बाग का मुद्दा गर्म कर या देशद्रोही कह कर चुनावों की दिशा तय नही कर सकतीं।

जनता विकास चाहती है, बिजली पानी मुफ्त चाहती है, घर बैठे सुविधा चाहती है और अपने जीवन स्तर को महानगरीय परंपरा से सराबोर करना चाहती है। क्या ये स्वार्थी परंपरा की शुरुआत नही? सस्ती व सुलभ सुविधाऐं क्या मुफ्त होने से बेहतर होंगी? अमीर गरीब के बीच की खाई पटनी चाहिए पर किस कीमत पर? मुफ्तखोरी के ये आदत हमें और हमारे बच्चों को अपने कर्तव्यों से विमुख कर अंधकार युक्त गर्त में ले जाएंगी। मुफ्तखोरी की ये प्रथा आने वाले दिनों में देश को अपाहिज बना देगी। ये व्यवस्था आरक्षण की व्यवस्था से भी खतरनाक है क्योंकि आरक्षण में भी कर्म करने वाले को ही फल मिलता है।

बच्चे अपने माँ बाप की नकल करते हैं। जब भौतिक सुख सुविधा मूल्यहीन होगी तो कार्य करने की इच्छा ही नही होगी। क्या हम निकम्मे वेनुजुयेला प्रशासन को भूल नही गए जिनकी नीतियों के कारण वहां की जनता और पूरा देश ही मुफ्तखोरी की आदत या अकर्मण्यता के कारण नष्ट हो गया। लोकलुभावन वादे जो मुफ्तखोरी को बढावा देते हैं वो लोगों को मेहनत से दूर विकास की ओर नही बल्कि उनकी अगली पीढ़ी को भी अपाहिज बनाते हैं।

राजनीतिक पार्टियों ने हमें सॉफ्ट हिन्दू और हार्ड कोर हिन्दू में बाँट दिया है। सॉफ्ट हिन्दू को केवल रोटी, कपड़ा और सुविधा की दरकार है जबकि हार्डकोर हिन्दू सुविधा के साथ साथ देश का विकास भी चाहता  है। राज्यों के चुनाव में राष्ट्रीय महत्व के मसले कम कारगर और आत्मघाती होते हैं। सबसे अफसोस कि बात है हमारी मीडिया डिबेट के नाम पर तल्खी बढ़ाने वाले बयानों को प्रसारित कर रही है। उचित कहा गया है कि दुनिया मे जो बाँटोगे वो ही मिलेगा।

नकारात्मक ऊर्जा राष्ट्रीय वातावरण को दूषित करते इस हद तक चली गयी है कि धर्मनिरपेक्षता पीछे छूट गयी और लोगों को विकास से हटा कर असली मुद्दों से भटका दिया गया है।  राष्ट्रीय पार्टियों और जनता को विचार करना होगा कि चीन व जापान की तरह राष्ट्रहित में विकास चाहिए या स्वार्थी राजा और स्वार्थी प्रजा को स्वमसिद्ध करना चाहिए।

आज की पब्लिक चाहती है नेता अपनी मुफ्तखोरी छोडें, और जनता को सुविधा उपलब्ध कराए। भारत में नेता नाम का प्राणी ऐसा है जिसके खर्चे जनता उठाती है और वो अपनी अगली पीढ़ी के लिये एसेट्स बनाता है। क्या पूरे भारत मे कोई नेता है जिसने अपनी मुफ्तखोरी छोड़ कर जनता को मुफ्तखोर बनाया? दिल्ली के वोटरों ने बात दिया कि भरे पेट ही भगवान का भजन हो सकता है, राष्ट्रभक्ति मुफ्तखोरी पर हावी हो गई। हम ये कह सकते हैं कि केजरीवाल ने पॉजिटिव चुनाव प्रचार से सामने वाली पार्टी के नकारात्मक चुनाव प्रचार को हराया है। लेकिन सच्चाई यही है

जिस तरह अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं को महंगे उपहारों और चिकनी बातों में फँसा कर पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया था, मुफ्तखोरी की ये परंपरा कहीं पुनः हमारे नैतिक मुल्यों का हश्र कर इतिहास में वर्तमान को काली स्याही से लिखने पर विवश न हो। हमें दिल्ली को सक्षम बनाना है चार नहीं और इसके लिए हमें मुफ्तखोरी की आदत छोड़नी पड़ेगी।

“अजगर करे न चाकरी, पंछी उड़े न डाल,

दिल्ली वाले कह रहे, सब करें केजरीवाल।

 

Ritu Srvastava- IBN NEWS

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