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बगहा प,च,बिहार-सृष्टिकाल से ही है सूर्यषष्ठी व्रत की परंपरा जाने छठ व्रत की शुभ मुहूर्त

विजय कुमार शर्मा की कलम से बगहा प,च,बिहार

मंगलवार (29 अक्टूबर 2019) लोक आस्था का महान पर्व सूर्यषष्ठी (छठ) व्रत का चार दिवसीय अनुष्ठान 31 अक्टूबर गुरुवार को नहाय-खाय के साथ प्रारंभ होगा। छठ व्रती 1 नवम्बर शुक्रवार को खरना एवं 2 नवम्बर शनिवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। वहीं 3 नवम्बर रविवार को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इस चार दिवसीय अनुष्ठान का विधिवत समापन हो जाएगा।
शास्त्रों में द्वादश आदित्यों की कल्पना भगवान सूर्य की द्वादश शक्तियों के रूप में की गयी है। भगवान सूर्य प्रत्यक्ष देवता माने जाते हैं। इनकी पूजा की परंपरा बहुत पहले से भारत में ही नही बल्कि विश्व में व्याप्त है,क्योंकि सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्र भी प्रकाशित होते हैं एवं तारे भी चमकते हैं जो अनेक ग्रहों,नक्षत्रों के रूप में माने जाते हैं। भगवान सूर्य के कारण ही दिन तथा रात का वर्गीकरण सम्भव हो पाता है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सौर ऊर्जा महत्वपूर्ण मानी जाती है। सूर्य की पूजा करने का विधान तो संध्योपासन में भी है जिससे मानसिक एवं शारीरिक ऊर्जाएं प्राप्त होती हैं। इसके अतिरिक्त हमारी भारतीय संस्कृति भगवान सूर्य को परब्रह्म के रूप में मानती है। सूर्य की उत्पत्ति परमात्मा की आँखों से मानी गयी है। वे जड़ चेतन समस्त सृष्टि की आत्मा हैं। उक्त जानकारी महर्षिनगर स्थित आर्षविद्या शिक्षण प्रशिक्षण सेवा संस्थान-वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पाण्डेय ने दी। उन्होंने बताया कि सूर्योपासना से आयु, विद्या, बुद्धि, बल, तेज एवं मुक्ति की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद शास्त्र में भी आरोग्य की प्राप्ति के लिए सूर्योपासना का निर्देश दिया गया है- आरोग्यं भास्करादिच्छेत् अर्थात् आरोग्य के लिए सूर्य की पूजा करें।
जहाँ तक छठ माता का सम्बंध है,जिनकी पूजा सूर्यषष्ठी व्रत के रूप में की जाती है,यह शक्ति रूपा मानी जाती है। इनकी पूजा पौराणिक काल से चली आ रही है जिसका निर्देश लौकिक छठव्रत की कथाओं,मान्यताओं एवं महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले गीतों में मिलता है और यह प्रत्यक्ष भी है। सत्व,रज,तम ये तीनों ही गुण छठी माता के नियंत्रण में काम करते हैं जो सृष्टि के संचालक एवं संवर्द्धक हैं। प्राचार्य पाण्डेय ने बताया कि सूर्यषष्ठी व्रत का विधान सृष्टिकाल से ही चला आ रहा है। यह व्रत सत्युग में नागकन्या के उपदेश से शर्याति नामक राजा की पुत्री तथा च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या ने किया था। भगवान राम ने सूर्योपासना करके ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। महारथी कर्ण ने सूर्योपासना से ही कवच कुण्डल प्राप्त किए थे। धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्योपासना से ही राज्यलक्ष्मी पुनः प्राप्त की थी। व्रती माताओं में छठी माता शक्तिरूप में विद्यमान होकर जगत् का कल्याण करती हैं,यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। सामाजिक शक्ति के रूप में छठी माता घाटों पर श्री सविता (सिरसोप्ता) के रूप में बनायी जाती है और अस्ताचल होते हुए सूर्य से उनका सम्बंध बिठाया जाता है जो एक शक्ति का प्रत्यक्ष रूप ही है। छठ पूजा में ईंख, अदरख, मूली, हल्दी, सुथनी, अरवी, नीम्बू, बोड़ी, नारियल, सिंघाड़ा, केला, साठी चावल, गुड़, पान, लौंग, इलायची, सुपारी आदि औषधियों एवं विभिन्न प्रकार के ऋतुफलों का उपयोग भी अर्घ्य के रूप में किया जाता है। अतः इस व्रत का औषधियों के संबर्द्धन व संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। बिहार पूर्व दिशा में स्थित है और सूर्योदय भी पूर्व दिशा में ही होता है। शक्तिरूपा माता सीता का सम्बंध भी यही से है । अतः सूर्य की उपासना बिहार के कोने कोने में होना स्वाभाविक है। सूर्यषष्ठी व्रत श्रद्धा व विश्वास के साथ करने से मनुष्य के ज्ञाताज्ञात समस्त पापों का नाश होता है तथा मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

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