Breaking News
Home / Highlight's / लोगों के व्यक्तित्व या सिफत को तय करता है और साथ-साथ यह भी, कि वे किस तरह के निजाम के काबिल हैं (पत्रकार )

लोगों के व्यक्तित्व या सिफत को तय करता है और साथ-साथ यह भी, कि वे किस तरह के निजाम के काबिल हैं (पत्रकार )

अप्रैल 1904 में, रूजवेल्ट ने कहा था “वह आदमी जो लिखता है, जो महीने-दर-महीने, दिन-रात असबाब जुटाकर लोगों के विचारों को शक्लो-सूरत देता है, दरअसल वही आदमी है जो किसी अन्य व्यक्ति की बनिस्पत, लोगों के व्यक्तित्व या सिफत को तय करता है और साथ-साथ यह भी, कि वे किस तरह के निजाम के काबिल हैं।”

तात्पर्य यह है कि पत्रकारों पर दायित्व है सत्ताधारी नेताओं के प्रति बिना किसी जवाबदेही के अपनी लेखनी से लिखते रहने का,किन्तु कुछ ऐसे भी हैं जो विपक्ष या सत्ताधारी के गुणगान में रात-दिन एक कर देते हैं, या उनके खिलाफ सबूतों को नज़रअंदाज़ करते हैं, ऐसे पत्रकार दरअसल जन-विरोधी और अनैतिक सरकारों के हिमायतियों की गिनती में आते हैं। ऐसे ही पत्रकार ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों के लिए चुनौती बन जाते हैं जिनके कारण उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है।

सत्ताधारी व्यक्ति और लक्ष्मी से संपन्न व्यक्ति मीडिया और पत्रकारों को अपने पक्ष में करना जरूरी मानते हैं क्योंकि पत्रकारों में वह ताकत है जिसकी रूजवेल्ट ने भी अपने कथन में पुष्टि की थी। लेकिन एक सत्ताधारी शक्तिशाली व्यक्ति किसी पत्रकार को किस हद तक अपने वश में कर सकता है, यह बात बहुत हद तक उस विशेष व्यक्ति पर निर्भर करती है।
पत्रकारिता कठिन मेहनत और मनोवैज्ञानिक दबाव का सामना करती है क्योंकि पत्रकारों को समाज के ताकतवर तबकों के दबाव और क्रोध का भी सामना करना पड़ता है। इसलिए किसी खबर पर काम करने के लिए पत्रकारों का ऐसी स्थिति से निपटने का कौशल और रणनीति बनाने की कला आना भी जरूरी है।

निसंदेह, सत्ताधारी तबकों को सच का आईना दिखाने से रोकने के लिए यह लोग आपके समक्ष हर तरह की चुनौतियां उत्पन्न करेंगे और धन का भी लालच देंगे किंतु सभी चुनौतियों को पार करने का मतलब यह कदापि नहीं है कि वह अपना मंतव्य सिद्ध करने में असमर्थ हो जाएंगे। अंततः वे अपने अनैतिक कार्य के लिए पत्रकारों को अपनी राह से हटाने को तैयार हो जाएंगे।
देश के अलग-अलग हिस्सों में आए दिन पत्रकारों पर हमले होते हैं चाहे वह राजनैतिक हमले हों या द्वेष आधारित। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के आंकड़ों मुताबिक साल 2015 से लेकर अब तक करीब 142 पत्रकार हमलों का शिकार हो चुके हैं।

वहीं साल 1992 से 2016 के बीच करीब 70 पत्रकार मारे जा चुके थे। मरने वालों में स्वतंत्र पत्रकारों की संख्या ज्यादा थी। पत्रकारों पर हमलों की रिपोर्ट इसलिए भी नहीं जनता के बीच सुर्खियाँ नहीं बनती क्योंकि पत्रकार होने का मतलब ही है कि उन्हें स्थानीय नेता, पुलिस या रसूखदार लोगों से धमकियां मिलती होंगी। इन हत्याओं ने देश में प्रेस की आजादी से जुड़े सवालों को फिर उठा दिया लेकिन समाचार चैनलों पर हत्या पर तमाम बातें और बहसें बहुत होती हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर बदलाव बहुत दूर है।

मध्यप्रदेश के भिंड जिले में मोटरसाइकिल सवार पत्रकार संदीप शर्मा को दिन दहाड़े निर्ममतापूर्वक एक ट्रक कुचल देता है। बिहार के भोजपुर जिले में पत्रकार नवीन निश्चल और उनके साथ विजय सिंह की भी एक वाहन के नीचे आ जाने से मौत हो जाती है। संदीप न्यूज वर्ल्ड चैनल के साथ बतौर स्ट्रिंगर काम कर रहे थे। अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में उन्होंने मध्य प्रदेश में रेत खनन माफिया कारोबार से जुड़े भ्रष्टाचार और अराजकता को उजागर किया था। क्या सरकार और आमजन ये विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि संदीप की मौत, कोई आम सड़क हादसा है, बल्कि खनन माफिया की सोची समझी हकीकत है। संदीप के दोस्त विवेक शर्मा ने डीडब्ल्यू को बताया, “राज्य का अवैध रेत माफिया बहुत ही मजबूत है। जांच भी एकतरफा होगी। पत्रकारों को इन माफियाओं और इन गिरोहों की ओर धमकियां मिलती रहेंगी।”

वहीं बिहार में मारे गए पत्रकार नवीन निश्चल और उनके साथी विजय सिंह, हिंदी समाचार समूह दैनिक भास्कर के लिए काम करते थे। पत्रकारों की ये असमयिक मौतें दिखाती हैं कि अगर वे अपने काम को सच्चाई और ईमानदारी के साथ करते हैं तो उन्हें मृत्यु का पारितोषिक भी देने में अराजकतत्व पीछे नही रहते। क्या ये सत्य स्थापित नही होता है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था है ही नहीं।

कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) के एशिया कार्यक्रम संयोजक स्टीवन बटलर ने डीडब्ल्यू से अपने इंटरव्यू0 में कहा कि “प्रशासन को पत्रकारों की मौतों की गहराई से जांच करानी चाहिए ताकि ये पता चल सके कि क्या इनकी रिपोर्टिंग और इनके काम के चलते तो इन्हें निशाना बनाया गया है।” सीपीजे की वैश्विक रैंकिंग में भारत का स्थान 13वां है और सीपीजे का दावा है कि भारत में पत्रकारों की हत्या का एक भी मामला पिछले दस सालों में सुलझा नहीं है।

इसी कड़ी में केरल के पत्रकार संजीव गोपालन को कथित तौर पर पुलिस वालों ने बेदर्दी से पीटा क्योंकि पत्रकार ने जनता की भाषा मे कहें तो पुलिस से पंगा ले लिया था।
एक अन्य मामले में पश्चिमी त्रिपुरा जिले के मंडई में एक प्रदर्शन के दौरान टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या कर दी गई। कम्युनिस्ट पार्टी की नेता वृंदा करात ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, “ये हमलावर कट्टरपंथी ताकत हैं जिन्हें सहयोग हासिल है और सच बोलने वाली इसकी कीमत चुका रहे हैं।”

पत्रकारों पर हमले की घटनायें बेहद निंदनीय और शर्मनीय है। देश में सरकारें बदल रही हैं और राजनीति की परिभाषा भी बदल रही है, पर जनता और प्रशासन को जोड़ने वाली मध्यस्थ कड़ी यानी पत्रकार असुरक्षित है। पत्रकार प्रोटेक्शन एक्ट को लोकसभा में लाने की हर पार्टी अपने चुनावी घोषणापत्र में बात करती है पर जमीनी हकीकत कुछ और है। राजनीति करने में ये राजनेता, सत्तापक्ष या विपक्ष, यह भी नहीं देख रहे हैं कि उनकी इस ओछी राजनीति के कारण अपराध और अपराधियों की हिम्मत निरंतर बढ़ रही है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रेस की आजादी और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बचाए रखने के लिए मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धताओं की जरूरत होती है परंतु सत्ताधारी और विपक्ष दोनो ही इन मापदंडों पर खरे नही उतरते।

माओवाद प्रभावित छ्त्तीसगढ़ हो या विवादों में रहने वाले कश्मीर में, पत्रकारिता करना सत्ता और आतंक दोनो के खिलाफ आवाज उठाना खतरनाक साबित हो सकता है। दिल्ली की डेली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के अध्यक्ष एसके पांडे ने कहा, “देश के ऐसे जोखिम भरे इलाकों से निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना आसान नहीं है।”

जैसे-जैसे समाज में अत्याचार, अराजकता, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी दिनों दिन बढ़ रही हैं। मीडिया और पत्रकारों पर हमला वही करते हैं या करवाते हैं जो अराजकता में डूबे हुए हैं और दोहरा चरित्र जीते हैं।

जनपद या कस्बों के पत्रकार ही अधिकतर अपराधियों के निशाने पर रहते हैं क़्योंकि जनपद में काम कर रहे पत्रकारों की खबरें अधिकतर स्थानीय स्तर के भ्रष्टाचार, ग्राम पंचायत के फैसलों,ग्राम सभा की गतिविधियों, सड़कों की बदहाली, बिजली की समस्या, स्थानीय अधिकारियों, विधायको के कारनामों और स्थानीय आपराधिक मामलों आदि पर केंद्रित रहती हैं। ताजा उदाहरण बिकरू गांव के विकास दुबे का है जहां प्रशासन, पुलिस और स्थानीय नेताओं के गठजोड़ से स्थानीय खबरों से जनता अनजान रही।

लेकिन इन धमकियों, डर, द्वेष और हमलों का शिकार सिर्फ पत्रकार ही हों, ये सत्य नही। वे सभी लोग जो समाज में जन सूचना अधिकार के तहत पारदर्शिता लाने के लिए काम करते हैं उन पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहता है। ये सारे मामले सूचना के अधिकार कानून के सफल क्रियान्यवन को लेकर भी सवाल उठते हैं।

अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव के वेंटकेश नायक ने डीडब्ल्यू को बताया, “सरकार ने अब तक व्हिसल ब्लोअर्स सुरक्षा कानून को लागू नहीं किया गया है। लेकिन जरूरत है कि साल 2014 में संसद द्वारा बनाए गए इस कानून को लागू किया जाए ताकि ऐसा सिस्टम बन सकें जो पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दे सके.”
गाज़ियाबाद में बदमाशों के हमले में गंभीर रूप से घायल पत्रकार विक्रम जोशी की मौत हो या कोई और घटना, कहीं भी अब पत्रकार सुरक्षित नहीं।

क्या पत्रकारों के परिवारों और उनके स्वयं के मौलिक अधिकारों का हनन लगातार नहीं हो रहा। क्या हम यह नहीं कह सकते कि पत्रकारों का कोई मानव अधिकार नहीं होता। क्या मानवाधिकार केवल अपराधियों तक ही सीमित है। अपनी जीविका के लिए ख़तरों तक से लड़ने को तैयार और लेखनी द्वारा समाज को हिलाने की ताकत रखने वाला पत्रकार अपने ही जीवन के मौलिक अधिकारों जो संविधान द्वारा प्रदत्त हैं, से विहीन कब तक रहेगा?

खैर, मौजूदा दौर की सच्चाई है कि वर्तमान समय में देश में प्रशासन और अराजकता के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत चुकानी पड़ती है। पत्रकारिता अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो पत्रकार इसके सजग प्रहरी हैं जो अलग-अलग परिदृश्यों में अपनी सार्थक जिम्मदारियों को निभा रहें है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और पत्रकारों को लोकतंत्र का प्रहरी ऐसे ही नही कहा जाता। जहां एक ओर पत्रकारों का प्रयास लोगों में जागरूकता पैदा करके लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है, तो वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के शेष स्तंभों यानी कार्यपालिका और न्यायपालिका पर भी अंकुश लगाने का कार्य करते हैं। परंतु चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता को अभी अपना वास्तविक स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। ईमानदारी से कार्य करने का इनाम जख्म की शक्ल में मिले, तो इससे न सिर्फ देश की कानून व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है बल्कि यह लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं है।

पत्रकार सुरक्षा कानून समय की मांग है। केंद्र और राज्य सरकारों दोनो को ही पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की दिशा में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। युवा भाजपा नेता योगेश्वर चंद्राकर के अनुसार “सभी वर्ग के अधिकारों और कर्तव्य के लिए आगाह करने वाले पत्रकार अब स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और इन परिस्थितियों में पत्रकारों की अभिव्यक्ति को संरक्षित करने काननू बनाया जाना चाहिए।”

पत्रकार विषम परिस्थितियों में चाहे लाठी चार्ज, बाढ़-सूखा की स्थिति, दुर्गम क्षेत्रों में होने वाली विभिन्न घटनाओं और प्राकृतिक तथा मानवीय आपदा हो या आतंकवाद व असामाजिक तत्वों के बीच जान जोखिम मे डालकर जीवटता से अपने कार्य को निभाते हैं। असमाजिक तत्चों के खिलाफ खबर प्रकाशन करने पर स्वयं और परिवार दोनो को ही आर्थिक तथा जान का जोखिम भी उठाना पड़ता है। यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं होंगे तो जनता की आवाज कौन सुनेगा और प्रशासन की अतिक्रमणवादी नीतियों को कौन जनता के समक्ष प्रस्तुत करेगा? दूसरी ओर अगर वे खुद व्यवस्था का हिस्सा बन जाएंगे, तो वे व्यवस्था से सवाल कैसे पूछेंगे?

सही कहा गया है कि..
“अगर आपने कुदाल चलाया है तो आप शर्तिया ही रिपोर्टर होंगे क्योंकि खोदकर सच निकालना ही रिपोर्टिंग है।
अगर आपको कभी बेआबरू किया गया है तो आप शर्तिया ही रिपोर्टर होंगे क्योंकि तिरस्कार करने वाले को कटघरे में खड़ा करना ही रिपोर्टिंग है।
अपराधी किसी की गर्दन मरोड़ सकते हैं लेकिन पत्रकारों के विचारों को नहीं मरोड़ सकते।
लेखनी में बु रहेगी जब तलक ईमान की, जंग अंत तक लड़ेगी कलम हिंदुस्तान की।”

 

डॉक्टर ऋतु श्रीवास्तव IBN NEWS

About IBN NEWS

It's a online news web channel running as IBN24X7NEWS.

Check Also

पुलिस चौकी के सामने सोशल डिस्टेंस की धज्जियां

वाराणसी- भिखारीपुर चौराहे पर बंगाल स्वीट हाउस पर मिठाई ले के लिए ग्राहकों की भीड़ …

अयोध्या मुक्त हुई अब काशी व मथुरा करेगें कूच: विनय कटियार

IBN NEWS अयोध्या ब्यूरो चीफ सत्यम सिंह अयोध्या बजरंग दल के संस्थापक व पूर्व राज्य …

यूपी की कैबिनेट मंत्री कमला रानी का निधन

रिपोर्ट IBN NEWS कुशीनगर लखनऊ। पूर्व सांसद एवं वर्तमान में योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री …

गड्ढे में नहाने गया युवक की पानी में डूबने से हुई मौत, मचा कोहराम

बलिया- सिकंदरपुर थाना क्षेत्र के काजीपुर में गड्ढे में नहाने गए एक युवक के पानी …

योगी- सरकार ने दिया बहनों को तोहफा, रक्षाबंधन पर बस यात्रा मुफ्त, खुली रहेंगी मिठाई की दुकाने

सरकार ने दिया बहनों को तोहफा, रक्षाबंधन पर बस यात्रा मुफ्त, खुली रहेंगी मिठाई की …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WhatsApp For any query click here