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मृत विशाल जी

वो पागल अब नहीं रहा, जो कभी विशाल जी था

हरिकिशन अग्रहरि की कलम से

अहरौरा – मीरजापुर ।पंख पसारे पवन सहारे उड़ता जा पंक्षी अकेला उड़ता जा। बाण लगे हैं हर मुंडेर पे, अब तूं घायल होगा, अकेला उड़ता जा पंक्षी।
आज कविता की यह पंक्तियाँ चरितार्थ हुई जब अहरौरा बाजार के सत्यानगंज मुहल्ले में एक पागल सड़क के किनारे मृत पाया गया जो कभी विशालजी नाम से विख्यात था। इसकी उम्र लगभग पचपन वर्ष के आसपास रही होगी। जब मुहल्ले वालों ने इसे मृत देखा तो कानो कान सूचना फैल गई। इसके बाद अंतिम संस्कार हेतु कुछ समाजसेवी व मुहल्ले वाले आगे आये और चंदा जुटाने लगे। इस पागल के अन्तिम संस्कार से जुड़ी नियमावली पर कार्य योजना तैयार हो रही थी जिसको परिणित करने की कवायद जारी थी। सभ्य समाज में सड़क के किनारे किस तकलीफ से यह पागल मरा, किसी को जानने की फुर्सत नहीं है। हां, चर्चा जारी थी कि हो सकता है लाकडाउन में भूख से मर गया हो।

मृत विशाल जी

जब सभ्य समाज में अंग्रेजी बोलने वालों को उच्च शिक्षित समझा जाता था उस समय वर्तमान का यह पागल विशाल जी के नाम से जाना जाता था। उस समय विशाल जी के प्रतिभा को अर्थवाद की तराजू पर तौला गया। इसके कुछ दिनों बाद बेहद संवेदनशील विशाल जी खुद को संभाल नहीं पाये। छापा सदृश राइटिंग लिखते थे।

फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले विशालजी मौन हो गये। पहले सड़क पर पैदल चलते-चलते एक जगह रूक जाते और वहीं शांत ठहर जाते लेकिन कालांतर में विशालजी पंजों के बजाय घूटनों पर बैठ चलने लगे क्योंकि ये शारीरिक अपंगता का शिकार हो गये थे। इस दौरान विशालजी ना तो किसी से भीख मांगा और ना ही किसी को कुछ कहा। मौन विशाल जी दुनिया देखते रहे जिसे लोग पागल समझने लगे थे। परिवार और कुटुंब के साथ ही साथ समाज के लिए भी विशालजी को समझने के लिए वक्त नहीं था।

गंदे कपड़ों में लिपटा विशाल था और जहाँ सड़क पर रूकता। खाने को किसी संवेदनशील द्वारा मिल जाता था और यही उसका जीवन था। ना शिकवा, ना शिकायत बस मौन। यह नहीं था कि मुंह में जुबान न थी, थी मगर समझने वाला उसकी जिन्दगी में नहीं आया।

सड़क के किनारे हलुवाई की दुकानों के बाहर रखे कूड़ेदान के बगल में चुपचाप बैठा आदमी, इसकी बगल से बड़ी बड़ी गाड़ियां , स्कूटर सवार सभ्य, सामाजिक लोग , संस्कार ज्ञान बांटने वाले लोग, सफेद लिबास को गंदगी से बचाते लोग न जाने कितनी बार इधर से उधर और उधर से इधर मौन निकल जाते थे क्योंकि वह पागल था, लावारिस था।
संवेदनशीलता की पराकाष्ठा में मौन रहने वाला पागल आज मर गया है और अब सड़क का चौराहा सुरक्षित है।

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