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सांसद पंकज चौधरी द्वारा संसद में देवदह का मुद्दा उठाये जाने के बाद पहली बार जिला प्रशासन की देखरेख में शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन आयोजित किया

रिपोर्ट अरविंद यादव ibn24x7news महाराजगंज

महराजगंज सांसद पंकज चौधरी द्वारा संसद में देवदह का मुद्दा उठा जाने के बाद पहली बार जिला प्रशासन की देखरेख में देवदह बौद्ध विकास समिति व सिटिजन फोरम ने लक्ष्मीपुर क्षेत्र के बनर्सिहा कला के देवदह टीला पर शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन आयोजित किया। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय बुद्धिस्ट फेडरेशन लद्दाख के अध्यक्ष 98 वर्षीय लामा लोपजंग ने कहा कि पूरी दुनिया के बौद्धिस्टों को देवदह की तलाश है। यह भगवान गौतम बुद्ध की ननिहाल है। ऐसे में इस पवित्र जगह को पहचान दिलाना बेहद जरूरी है। पहली बार इस पवित्र भूमि पर वे आया हैं। पहचान मिलने के बाद देवदह को बौद्ध सर्किट के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में ख्याति मिलेगी। महराजगंज जनपद का नाम विश्व पटल पर आ जाएगा।*

साक्ष्यों के अनुसार देवदह की गौतम बुद्ध की ननिहाल

साहित्यकार डॉ परशुराम गुप्त ने कहा कि बौद्ध ग्रंथों के साक्ष्यों के मुताबिक देवदह ही गौतम बुद्ध की ननिहाल है। साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि रोहिन नदी के पश्चिम देवदह है। यह नदी कोलीय व शाक्य राज्य को बांटती थी। रोहिन नदी के जल को बंटवारे को लेकर हमेशा विवाद होता था। गौतम बुद्ध की पहल पर नदी का विवाद खत्म हो गया था।

बौद्ध स्थलों से दूरी के हिसाब से भी देवदह ही बुद्ध की ननिहाल

नालंदा विश्वविद्यालय पटना के पूर्व कुलपति प्रो रविंद पन्थ ने देवदह के इतिहास पर चर्चा करते हुए कहा कि यहां का इतिहास 600 ईसा पूर्व का है। कपिलवस्तु, लुम्बिनी, सारनाथ से देवदह की दूरी के हिसाब से देवदह ही गौतम बुद्ध की ननिहाल है। जिस तरह से 150 वर्ष पूर्व नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास कोई नहीं जानता था। खुदाई होने के बाद उसका इतिहास पता चला। उसी तरह देवदह की विधिवत खनन हो तो शत-प्रतिशत यह सिद्ध हो जाएगा कि यही देवदह है। सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय वाराणसी पाली भाषा के विभागध्यक्ष आचार्य डॉ रमेश प्रसाद ने कहा कि बौद्ध धर्म को मानवतावादी धर्म बताते हुए कहा कि देवदह में ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिससे यह साबित होता है कि देवदह ही गौतम बुद्ध का ननिहाल है। यहां जो भी खण्डहर, टीले, पोखरे विद्यमान हैं वह सब गौतम बुद्ध के ननिहाल से मिलता है।

600 ईसा पूर्व बौद्धाकालीन मिले हैं अवशेष

लखनऊ से आए राज्य पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी नरसिंह त्यागी ने कहा कि वर्ष नवम्बर 2017 में उन्होंने अपनी टीम के साथ इसका सीमांकन किया था। यहां जो भी अवशेष मिल रहे हैं वह सब 600 ईसा पूर्व बौद्ध कालीन हैं। देवदह के साक्ष्य इस टीले पर हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह गौतम बुद्ध की ननिहाल ही है। इसका विकास होना आवश्यक है।

देवदह के लिए उत्थान प्रयास जारी: सांसद

सांसद पंकज चौधरी ने कहा कि उन्हें गर्व है कि वे बुद्ध की धरती पर पैदा हुए हैं। देवदह का उत्थान और पर्यटन स्थल बना कर विश्व के मानचित्र पर लाने का प्रयास सरकार के माध्यम से कर रहे हैं। प्राचीन बौद्ध स्थल गौतम बुद्ध की ननिहाल देवदह के विषय मे मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री को अवगत करवा कर विकास कराएंगे।

असली पहचान के लिये टीले का खनन आवश्यक: डीएम

डीएम अमरनाथ उपाध्याय ने कहा कि देवदह एक बौद्ध स्थल है। यह तो निश्चित है। लेकिन इसके असली पहचान के लिये टीले का खनन आवश्यक है। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि बर्निसहा कला देवदह ही भगवान बुद्ध की भूमि है। जिला प्रशासन इसकी पहचान के लिए पूरी तरह से तैयार है।

इन विद्वानों ने देवदह को पहचान दिलाने की उठाई मांग *

अन्तर्राष्ट्रीय बुद्धिस्ट फेडरेशन लद्दाख के अध्यक्ष लामा लोपजंग के अलावा बुद्धिस्ट स्टडी सेंटर नई दल्ली के कामाख्या रमन त्रिपाठी, बुद्धिस्ट फोटोग्राफर चण्डीगढ़ सचिन तलवार, गोरखपुर विश्वविद्यालय कृष्णानंद त्रिपाठी, जवाहर लाल नेहरू पीजी कालेज के सैन्य विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ परशुराम गुप्त ने देवहद को पहचान दिलाने के लिए साक्ष्यों का हवाला देते हुए आवाज उठाई। सांसद पंकज चौधरी के अलावा डीएम अमरनाथ उपाध्याय, सीडीओ पवन अग्रवाल, एसपी रोहित सिंह ने आश्वासन दिया कि देवदह को भगवान बुद्ध के ननिहाल के रूप में जिस स्तर के प्रशासनीय सहयोग की जरूरत होगी उसे पूरा कराया जाएगा।

पुरातत्वविदों ने ड्रोन कैमरे में देवदह टीले को किया कैद

देवदह के टीले पर चंडीगढ़ से पहुंचे पुरातत्वविदों ने ड्रोन कैमरे की मदद से राजमहल के अवशेष, बुद्ध के टीले, अशोक स्तम्भ, राजमहल के पोखरे आदि का आसमान से फोटो लिया गया और विजुअल बनाया गया।

देवदह के टीले पर त्रिशरण व पंचशील का पाठ हुआ

लक्ष्मीपुर के बर्निसहा कला के देवदह के टीले पर शनिवार को पहली बार शासन प्रशासन की देखरेख में बुद्धम नमामि का उद्घोष हुआ। तथागत गौतम बुद्ध के त्रिशरण व पंचशील का पाठ किया गया।

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