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रामनगर प,च,: नीलकण्ठ नर्मदेश्वर महादेव मंदिर : वास्तु कला का असाधारण रूप

रिपोर्ट विजय कुमार शर्मा ibn24x7news प,च,बिहार

बिहार राज्य के प.चम्पारण के रामनगर शहर में अवस्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तु कला कृतियों के लिए बिहार उत्तर प्रदेश, झारखंड,पं.बंगाल(बंग्ला) सहित पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल में काफी लोकप्रिय है।इस मंदिर का निर्माण कार्य सन् 1879 में प्रारंभ हुआ जो सन् 1886 में पूर्ण हुआ। मंदिर के गर्भ गृह के गुम्बज की ऊंचाई 185 फीट तथा चारों कोणों में अवस्थित गुम्बजों की ऊंचाई 100-100 फीट है। भूमि से 10 फीट ऊँचे विशालकाय चबूतरे की लम्बाई 90 फीट व चौंड़ाई 86 फीट है। लगातार सात वर्षों तक चले इस अद्भुत मंदिर निर्माण में काठमांडू जयपुर,आगरा तथा वाराणसी के वास्तु शिल्पकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। मंदिर निर्माण से जुड़ी कथा इस प्रकार है :- तनहुँ राजवंश से संबंध रखने वाले सेन वंश के राजा प्रह्लाद सेन की पत्नी रानी विन्ध्यवासिनी देवी को भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर धर्म की रक्षा हेतु मंदिर बनाने का आदेश दिया। इसके बाद राजा स्वप्न में दिए गए आदेश के अनुसारनर्मदा(मध्यप्रदेश )नदी गए ,वहाँ से शिवलिंग लाकर शिवलिंग की स्थापना किए। नर्मदा से शिवलिंग मंगाए जाने के कारण मंदिर का नाम “नर्मदेश्वर”महादेव मंदिर पड़ा।

इस मंदिर के आग्नेय कोण में भगवान सूर्य की प्रतीमा, ईशान कोण में भगवान विष्णु की प्रतीमा, नैऋत्य कोण में भगवान गणेश की प्रतिमा तथा भंडार कोण में माता दुर्गा विराजमान हैं।
इस मंदिर की संरक्षिका रामनगर राज घराने की महारानी प्रेमा विक्रम शाह(सम्प्रति सदस्या,बालाधिकार संरक्षण आयोग, बिहार सरकार) हैं। मंदिर का देख-रेख संकिर्तन संघ के जिम्मे है, जिसके अध्यक्ष राजा मधुकर विक्रम शाह हैं। इस पावन मंदिर केभगवान भोलेनाथ के शिवलिंग व अन्य प्रतिमाओं पर काँवरिया पूरे सावन मास रामायणकालीन वाल्मीकि आश्रम नामक जगह से दुनिया की पहली नदी गंडक तथा स्वर्णरेखा व तमसा के पवित्र संगम(त्रिवेणी) से 65 कि.मी. की दूरी पैदल तय करके जलाभिषेक करते हैं। काँवर यात्रा के क्रम में अंतिम पड़ाव सबुनी पोखर माई स्थान होता है जहाँ चम्पारण काँवर संघ काँवरियों की सेवा करता है। प्रतिवर्ष लाखों काँवरिया जलाभिषेक करते हैं। वर्षों पूर्व बिहार सरकार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री व राज परिवार के सदस्य स्व. अर्जुन विक्रम शाह (कुमार साहब) ने सावन मास में सबुनी पोखरा पर एक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में इस धाम को “दूसरा बाबा धाम” बताया था।

कुछ त्रुटियों के कारण नब्बे के दशक में एक अद्वितीय गोला शिवलिंग के पास से निकला था और उत्तर दिशा में चला गया था। इस घटना को भगवान शिव की नाराजगी के रूप में देखा गया। उस समय के लोकप्रिय राजा श्री धनंजय विक्रम शाह ने भगवान शिव के सामने यह शपथ लिया कि वे प्रतिवर्ष सावन के पूरे माह में काँवरियों की सेवा करेंगे। अपनी प्रतिज्ञा को वे आज भी जारी रखे हैं। प्रति वर्ष सावन में वे बम सेवा हेतु काँवरिया पथ में निकलतेहै प्रकांड विद्वान पं. आचार्य दिनेश शुक्ल का मानना है कि त्रिवेणी धाम से पैदल नंगे पाँव आकर जल चढ़ाने वाले काँवरियों की सच्चे मन से माँगी गई हर इच्छा यहाँ अवश्य पूरी होती है।

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