राम व्याख्या से परे हैं और दृष्टि से भी परे हैं………..

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“राम”
सृष्टि भी हैं और सृष्टिकर्ता भी,
दृष्ट्या भी और दृष्टि भी,
जीवन भी और मृत्यु भी,
साधु भी और साधना भी,
पग भी वो और मार्ग भी,
अध्यात्म भी और बाह्मज्ञान भी।

राम व्याख्या से परे हैं और दृष्टि से भी परे हैं। फिर भी “राम” नाम की व्याख्या कवियों और महात्माओं ने अलग अलग तरीकों से की है:
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार परमात्मा अधर्म के नाश के लिये सर्वगुण सम्पन्न ऐसे व्यक्तित्व का सृजन करते हैं जो अपने पुरुषार्थ द्वारा समाज की बुराइयों का समाधान कर लोगों को मर्यादा की प्रेरणा देता है। उत्तर काण्ड में वाल्मीकि लिखते हैं-

“प्रादुर्भावं विकुरुते येनैतन्निधन नयेत् । पुनरेवात्मनात्मानमधिष्ठाय स तिष्ठति ।।
वाल्मीकि रामायण में राक्षस मारीच रावण से कहता है-
रामो विग्रहवान्धर्मः साधु सत्यपराक्रमः ।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिय ।।”

अर्थात राम तो धर्म की साक्षात् मूर्ति हैं, वे बड़े साधु और सत्य पराक्रमी हैं। जिस प्रकार इन्द्र देवताओं के नायक हैं, इसी प्रकार राम भी सब लोकों के नायक हैं। सत् पुरुष तो श्रीराम के इस रूप से परिचित हैं ही।
तुलसीदास के अनुसार-

“मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।”

अर्थात हे श्रीरघुवीर ! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि ! मेरे जन्म-मरणके भयानक दुःखकों हरण कर लीजिये।
कबीर लिखते हैं-

“सबमें रमै रमावै जोई, ताकर नाम राम अस होई ।
घाट – घाट राम बसत हैं भाई, बिना ज्ञान नहीं देत दिखाई।”

राम अगम हैं संसार के कण-कण में विराजते हैं। सगुण भी हैं निर्गुण भी। तभी तो वो कहते हैं “निर्गुण राम जपहुं रे भाई।”
गुरु नानक जी कहते हैं-

“नानक निरमल नादु सबद धुनि सचु रामै नामि समाइदा ” ॥१७॥५॥१७॥ (SGGS 1038)
गुरु नानक देव जी न केवल राम-नाम बल्कि नाद, शब्द, धुन, सच का एक ही अर्थ में प्रयोग कर रहे हैं ।

(सन्दर्भ- श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह-अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल पृष्ठ-8)
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में ‘साकेत’ की भूमिका में निर्गुण परब्रह्म सगुण साकार राम के रूप में अवतरित होते है ।

“किसलिए यह खेल प्रभु ने है किया ।
मनुज बनकर मानवी का पय पिया ॥
भक्त वत्सलता इसी का नाम है।
और वह लोकेश लीला धाम है ।
राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है॥”
(संदर्भ-साकेत में मैथिलीशरण गुप्त)

शायर अल्लामा इकबाल ने भगवान राम को इमाम-ए-हिंद कहा है-

“है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज,
अहल-ए-नजर समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद”

(संदर्भ-रेख्ता)
महात्मा गांधी ने कहा था, “आप मेरा सबकुछ ले लीजिये, मैं तब भी जीवित रह सकता हूँ। परन्तु यदि आपने मुझसे राम को दूर कर दिया तो मैं नहीं रह सकता।”
प्रखर समाजवादी और राजनीतिज्ञ डॉ. राममनोहर लोहिया कहते हैं- “जब भी महात्मा गांधी ने किसी का नाम लिया तो राम का ही क्यों? कृष्ण और शिव क्यों नहीं। दरअसल राम देश की एकता के प्रतीक हैं। महात्मा गांधी ने राम के जरिए हिन्दुस्तान के सामने एक मर्यादित तस्वीर रखी। गांधी उस राम राज्य के हिमायती थे। जहां लोकहित सर्वोपरि हो।”
इसीलिए लोहिया भारत माँ से मांगते हैं- “हे भारत माता! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो, राम का कर्म और वचन दो।”
हरि ओम पवार कहते हैं

“राम दवा हैं रोग नहीं हैं सुन लेना,
राम त्याग हैं भोग नहीं हैं सुन लेना,
राम हुआ है नाम लोकहितकारी का,
रावण से लड़ने वाली खुद्दारी का।”

श्रीराम जीवनवृत्त पर कई ग्रंथ लिखे गए लेकिन वाल्मीकि कृत रामायण ही प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में रामायण का अनुवाद किया गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधि भाषा में रामचरित मानस लिखी तो विदेशी भाषाओं में कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि हैं।
राम शब्द संस्कृत के दो धातुओं, रम् और घम से बना है। रम् का अर्थ है रमना या निहित होना। घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान अर्थात सकल ब्रह्मांड में निहित यानी चराचर जगत में विराजमान स्वयं बह्रम।
अयोध्या से विस्थापित एक तपस्वी ने संसार के सबसे बड़े आतंक के चेहरे रावण का वध करने के लिए भारत देश की सभी जातियों यानी नर, वानर, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और रीछ सबको साथ लेकर प्रयास किया और विजित हुए। क्या ये उस कालखंड की महानता का घोतक नही।

राम जाति, धर्म और समाज से परे हैं। वे नए समाज का निर्माण करते हैं जहां नर हों या वानर, मानव हों या दानव, अगड़े पिछड़े सब उनके सहचर हैं। निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, बंदर हों या रीछ, सब उनको प्रिय हैं। राम, भरत के लिए आदर्श भाई हैं, हनुमान के लिए प्रभु, प्रजा के लिए मर्यादापुरुषोत्तम हैं। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा हैं। बहुपत्नी प्रथा से इतर राम ने सीता के प्रति अपने विश्वास और प्रेम को प्राथमिकता दी। शक्तिशाली होते हुए भी राम संयमित हैं, सामाजिक हैं और लोकहितकारी हैं। वे मानवीय करुणा को समझते हैं “परहित सरिस धर्म नहीं भाई”।

वन में रहकर उन्होंने वनवासी और आदिवासियों को धनुष एवं बाण चलना सिखाया, संस्कार बताये, परिवार का मूल्य समझाया और धर्म के मार्ग पर चलकर अपने री‍ति-रिवाजों का पालन करना सिखलाया। वे नर के रूप में नारायन थे। उन्हीं के कारण हमारे देश में आदिवासियों के कबीले नहीं, समुदाय होते हैं और पूरे भारत के त्योहारों में समानता मिलती है। उन्होंने ही राष्ट्रीयता की परिभाषा समझाई क्योंकि अयोध्या से ले कर श्रीलंका तक सभी जातियों में एकता का सूत्रपात उन्हीं के कारण हुआ। साम्प्रदायिकता को उन्होंने एक सूत्र में पिरोते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत की।
यही कारण है कि ‘राम’ तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, कर्नाटक सहित नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी जिंदा हैं।

इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े स्थानों का पता वैज्ञानिक ढंग से लगाया। इन स्थानों में प्रमुख हैं- सरयू और तमसा नदी के आस पास के इलाके, प्रयागराज के पास श्रृंगवेरपुर तीर्थ, सिंगरौर में गंगा पार कुरई गांव, प्रायागराज, चित्रकूट (मप्र), सतना (मप्र), दंडकारण्य के कई स्थान, पंचवटी नासिक, सर्वतीर्थ, पर्णशाला, तुंगभद्रा, शबरी का आश्रम, ऋष्यमूक पर्वत, कोडीकरई, रामेश्‍वरम, धनुषकोडी, रामसेतु और नुवारा एलिया पर्वत श्रृंखला।

रामायण की प्रमाणिकता कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू), बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू), कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू), नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी), नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी), श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना ‘जानकी हरण’ (सातवीं शताब्दी), आदि से भी प्रमाणित होती है।

रामायण का आध्यत्मिक आधार भी है। देवी सीता भक्ति स्वरूपा हैं और राम ब्रह्मज्ञान के। ब्रह्मज्ञान के अभाव में भक्ति में भटकाव संभव है। परमज्ञान की प्राप्ति तभी संभव है जब भक्ति विश्वास से पूर्ण और मर्यादित हो।
शास्त्रों में लिखा है,“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”
अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।

राम का अर्थ समझने के लिए मनुष्य के सातों जन्म ही अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। जो परम ब्रह्म योगियों के ह्रदय में रमण करता है वह राम है। वह व्यक्ति जो संयमित, मर्यादित और संस्कारित जीवन जीता है, वह राम है। मर्यादापुरुषोत्तम राम की मर्यादा उस लक्ष्मण रेखा के समान है जो पार की गई तो विनाश करती है और मर्यादा में रहे तो सुख शांति प्रदान करती है। आज कलयुग में भी यह प्रासंगिक है। हम जानते हैं कि चीन ने अपनी मर्यादा रेखा को पार कर कोरोना विषाणु का निर्माण किया और अपने अड़ियल रवैए को जारी रखते हुए शांति प्रिय देशों से टकराव शुरू कर दिया। मनुष्य ने अपनी मर्यादा रेखा पार की तो ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण प्रदूषण, और मौसम में असंतुलन इत्यादि समस्याएं पैदा हुई।

आज जितनी भी समस्याएं मानव जीवन में भूकंप व बाढ़ आदि के रूप में दिखाई देती हैं, वह सब मर्यादा रेखा पार करने के कारण ही परिलक्षित होती हैं।
समय मुश्किल भरा हो, पीड़ादाई हो तो मन में ख्यालों की बाढ़ आ जाती है जिन्हें आप किसी भी व्यक्ति से बता नहीं पाते। महसूस होने वाली यह भावनाएं जो आपकी बेहद निजी होती हैं, उनको आप किस प्रकार प्रकट करेंगे और किस तरह के आचरण करेंगे यह राम हमें बताते हैं।

राम हमें बताते हैं कि दोस्त की तरह ही खुद से भी अच्छा बर्ताव करना चाहिए और आलोचना या खुद को कोसना नहीं चाहिए। हमें यहां पर ध्यान रखना होगा कि प्रत्येक व्यक्ति की सोच अलग होती है और व्यवहार के अनुसार बदलती रहती है। हमें बस स्वयं को स्वीकार करना होगा और स्वयं को ही बेहतर जानकर हम अपनी मर्यादाओं को तय कर सकते हैं।

स्मरण रहे राक्षस संस्कृति का हनन करते हैं और राम संस्कृति का सृजन करते हैं। राम भगवान की कृति मनुष्य को सुधारना, उसका पोषण करना अपने जीवन का उद्देश्य समझते हैं और यही मानव जीवन की सार्थकता का आधार है। यही सार्थकता हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को समझानी है।

यही कारण है ‘राम मंदिर क्यों जरूरी है’ इस सवाल के जवाब में साध्वी रितंभरा कहती हैं “आज हमारी संतानों को सफलता असफलता की शुचिता का बोध नहीं है। ऐसे दिग्भ्रमित संतानों के लिए राम जैसे आदर्श पुरुष जरूरी है। यह कहना कि भारत की सारी समस्याओं के समाधान हो जाएंगे मंदिर निर्माण से, गलत है, लेकिन मंदिर निर्माण का प्रारंभ राम राज्य की स्थापना का प्रथम चरण अवश्य साबित होगा।”
दशकों की कोशिश का फल अब, मिनटों में मिलने वाला है, रामलला के गृह प्रवेश का क्षणिक समय, अब आने वाला है।

राममय हो गयी अयोध्या, सियाराम ही सियाराम हैं,
मानस के हर मंदिर में अब रामलला विराजमान हैं।

डॉ ऋतु श्रीवास्तव IBN NEWS

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