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कोल इंडिया द्वारा जारी सेवानिवृत्त होने से पूर्व रिटायरमेंट लेने का स्कीम कोयला मज़दूरों के साथ छलावा – हरिद्वार सिंह

 

ब्यूरो रिपोर्ट तीरथ पनिका IBN NEWS अनूपपुर मध्यप्रदेश

एटक एसईसीएल के महासचिव एवं एसईसीएल संचालन समिति के सदस्य कामरेड हरिद्वार सिंह ने इस स्कीम के बारे में कहा है कि यह स्कीम कोयला मज़दूरों के साथ छलावा है। इस स्कीम को लेकर प्रबंधन द्वारा श्रमिक संघो से कोई चर्चा नहीं की गयी। इस स्कीम में सेवानिवृत्त होने से पूर्व रिटायरमेंट लेने की अवधि का कोई अतिरिक्त बेनिफिट नहीं दिया जा रहा है। इस स्कीम में पीएफ, पेंशन, ग्रेच्युटी, मेडिकल स्कीम आदि का बेनिफिट देने की बात कही गई है जो कि आज भी यदि कोई कर्मचारी कम्पनी की सेवा से रिजाइन करता है तो ये बेनिफिट दिए जाते हैं। फिर इस स्कीम का क्या मतलब?

इस स्कीम से यह समझ में आता है कि प्रबंधन की मंशा सिर्फ शारीरिक रूप से बीमार और कार्य करने में असमर्थ कर्मचारियों को मेडिकल अनफिट ना कर उन्हें इस स्कीम के माध्यम से नौकरी से बैठाना है। प्रबंधन चाहता है कि स्पेशल हाफ पे लीव और अल्टरनेट जाब ना देना पड़े। इस स्कीम के माध्यम से अनुकंपा नियुक्ति में भी कमी आएगी। इस स्कीम से कर्मचारियों को कोई अतिरिक्त फायदा नहीं है। वर्तमान सरकार एवं कोल इंडिया प्रबंधन का उद्देश्य नियमित कर्मचारियों की संख्या कम करके ठेका पद्धति के माध्यम से कम वेतन देकर कार्य कराना है। ठेका मज़दूरों को आज तक कोल इंडिया की हाई पावर कमेटी द्वारा निर्धारित वेज नहीं दिया जा रहा है।

कामरेड सिंह ने कहा कि वर्तमान समय एवं आने वाला समय कोयला मज़दूरों के लिए बहुत ही कठिन है। केंद्र सरकार देश के सभी पब्लिक सेक्टर को निजी हाथों में सौंपना चाहता है। 1972-1973 में कोल इंडिया का निजीकरण से राष्ट्रीयकरण हुआ, एक बार फिर कोल इंडिया को निजीकरण की राह पर लाया जा रहा है। कोयला कर्मचारियों ने बड़ी लड़ाई लड़कर सुविधाओं को प्राप्त किया लेकिन अब कर्मचारियों के मूलभूत सुविधाओं का हनन किया जा रहा है।

 

श्रम कानूनों में संशोधन कर कोयला मज़दूरों के अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है। हम सभी यूनियन को लामबंद होकर लड़ाई लड़नी चाहिए। यूनियन के भेदभाव को भुलाकर, विचारधारा से ऊपर उठकर सबको मिलकर सरकार के ऊपर कड़े से कड़ा प्रहार करना चाहिए। बीएमएस के साथियों से भी मेरा अनुरोध है कि जब इन्हीं सब चीजों को लेकर बीएमएस ने भी 05 फरवरी को मुख्यालय पर आंदोलन किया है तो क्यों ना हम मिलकर और आंदोलन करके तब तक कोयला खदान ठप कर दें, जब तक केंद्र सरकार एवं कोल इंडिया प्रबंधन मजदूर विरोधी कानूनों को वापस ना ले ले। जब कोल इंडिया से कोयला निकलना ठप हो जाएगा तो पूरे देश मे अंधेरे छा जाएगा तब भारत सरकार को मजबूर होकर कानून वापस लेना होगा। एक तरफ मोर्चे पर किसान मैदान में बैठे हैं तो दूसरी तरफ कोयला मजदूर बैठेंगे और किसान और मजदूर मिलकर के सरकार को हरा सकते हैं अन्य दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

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