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वट सावित्री व्रत की कथा

 

लेखक – पं.अनुराग मिश्र “अनु” 

वटसावित्री व्रत-

भारत वर्ष तीज-त्योहारों का देश हैं यहाँ लगभग हर माह कोई न कोई बड़ा पर्व पड़ता ही रहता है,पर्वों के इसी क्रम में इस बार 10 जून को वटसावित्री व्रत की पूजा होगी जिसको आम भाषा में “बरगदाही” भी कहा जाता है ! वट सावित्री व्रत सौभाग्यशाली महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिये व्रत रखकर करती हैं। हिंदी पंचांग के अनुसार हर वर्ष वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर होता है।

 

इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है और कथा का पाठ भी किया जाता है ! वट-सावित्री अर्थात वटवृक्ष जिसे आम भाषा में हम बरगद भी कहते उसकी पूजा सर्वप्रथम सावित्री नामक सती नारी ने की थी तबसे हर सौभाग्यवती स्त्री उसी परिपाटी से प्रेरणा लेते हुए अपने पति की लम्बी आयु और अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए वटसावित्री नामक ये व्रत रखती हैं ! हिन्दू मान्यता के अनुसार वट सावित्री व्रत सौभाग्य प्राप्ति के लिए एक बड़ा व्रत माना गया है। वट सावित्री व्रत के दिन पूजा के समय वट सावित्री व्रत की  कथा का श्रवण किया जाता है।

वट सावित्री व्रत की कथा

राजा अश्वपति भद्र देश के राजा थे। उनको संतान का सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा था। इसके लिए उन्होंने 18 वर्ष तक कठोर तपस्या की, जिसके बाद सावित्री देवी ने उन्हें कन्या प्राप्ति का वरदान दिया। इसी कारण सावित्री देवी के आशीर्वाद से प्राप्त उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बहुत ही रूपवान हुई। सावित्री के विवाह योग्य हो जाने पर योग्य वर न मिलने की कारण राजा अश्वपति बहुत दुखी रहते थे। अंत में निराश होकर राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री सावित्री को खुद अपने लिए वर खोजने के लिए भेजा । कई राज्यों में घूमने के पश्चात भी सावित्री को कोई भी योग्य वर नहीं मिला, अंत में निराश होकर अपने राज्य वापस लौटते समय एक जंगल में उसकी भेंट सत्यवान नामक एक पुरुष से हुई ।

 

सत्यवान से जब सावित्री की भेंट हुई उस समय सत्यवान अपने अंधे माता पिता की सेवा कर रहे थे ! सावित्री ने जब उनके बारे पूंछा में तो सत्यवान ने कहा कि वे भी एक राजकुमार हैं किन्तु उनके शत्रुओं ने छल से उनका राज्य छीनने के बाद उनके माता पिता को अँधा करके उन्हें अपने ही राज्य से बाहर निकाल दिय है इसी लिए वे अब इस जंगल में रहते हैं! सत्यवान से उनकी कहानी सुनकर सावित्री ने मन ही मन सत्यवान को अपना पति स्वीकार कर किया किन्तु अपने मन के भावों को प्रकट किये बिना वो अपने राज्य को वापस लौट गयी !

 

अपने राज्य वापस लौटने के बाद जब सावित्री ने अपने पिता को सत्यवान के विषय में बताया कि उसने अपने लिए सत्यवान को पति रूप में चुन लिया है ये सुनकर उसके पिता अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे विवाह कि अनुमति दे दी किन्तु जब इस घटना की जानकारी देवर्षि नारद जी को हुई तो उन्होंने राजा अश्वपति से सत्यवान् की  अल्प आयु के बारे में बताया। ये सुनकर राजा अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने तुरंत ये बात सावित्री को बताई किन्तु सावित्री ने सत्यवान को अपना पति बनाने का निर्णय नहीं बदला उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत समझाया, परन्तु सावित्री अपने धर्म से नहीं डिगी । सावित्री के प्रण के आगे अंततः राजा को झुकना पड़ा । सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। सत्यवान बड़े गुणवान, धर्मात्मा और बलवान थे। वे अपने माता-पिता का पूरा ध्यान रखते थे। सावित्री राजमहल छोड़कर जंगल की कुटिया में आ गई थीं, उन्होंने वस्त्राभूषणों का त्यागकर  दिया और अपने अन्धे सास-ससुर की सेवा में अपना समय बिताने लगीं ।

 

धीरे धीरे विवाह को एक वर्ष बीत गया और सत्यवान् की मृत्यु का दिन निकट आ गया। देवर्षि नारद ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। समय नजदीक आने से सावित्री अत्यंत अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया । आखिर वो दिन भी आ गया जिस दिन सत्यवान कि मृत्यु निश्चित थी ! प्रत्येक दिन की तरह सत्यवान भोजन बनाने के लिए जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे, तो उस दिन सावित्री भी उनके साथ गईं। वह सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था।

 

सत्यवान लकड़ी काटने पेड़ पर चढ़े, किन्तु अचानक ही उनके सिर में चक्कर महसूस होने के कारण वो पेड़ से नीचे उतर आये। ये देखकर सावित्री ने अपने पति को एक बरगद के पेड़ के नीचे लिटा दिया और स्वयं उसका सिर अपनी गोद में रखकर उसे सहलाने लगीं। सावित्री सत्यवान का सर सहला ही रही थी तभी अचानक सत्यवान अचेत हो गए ! उसी समय सावित्री को सत्यवान के प्राण ले जाने के लिए यमराज आते दिखे और वो सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे। ये देखकर सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे जाने लगीं।

 

यमराज ने सावित्री को अपने पीछे आने से बहुत मना किया परंतु सावित्री ने कहा हे यमदेव,आप मुझे मेरा धर्म मत सिखाइए,मेरा धर्म है कि जहाँ मेरे पति जायेंगे वहाँ उनके साथ मेरा जाना तय है ! बार-बार मना करने के बाद भी सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चलती रहीं। सावित्री की निष्ठा और पति परायणता को देखकर यमराज भी अचंभित रह गए उन्होंने सावित्री से कहा मैं सिर्फ मृत व्यक्ति के ही प्राण यमलोक को ले जाता हूँ तुम्हारी तो अभी काफी आयु बाकी है अतः तुम मेरे साथ नहीं आ सकती! यमराज की ये बात सुनकर भी सावित्री ने उनका पीछा नहीं छोड़ा ! अंत में परेशान होकर यमराज ने सावित्री से कोई वरदान मांगकर वापस लौट जाने को कहा सावित्री जैसे इसी क्षण के इंतजार में थी उन्होंने यमराज से वरदान के रूप में अपने अंधे सास ससुर के लिए ऑंखें और उनका खोया राज्य वापस माँगा !

 

यमराज ने उनका खोया हुआ राज्य वापस मिलने का वरदान दिया और सावित्री को वापस लौटने के लिए कहा किन्तु सावित्री लौटती कैसे ? सावित्री के प्राण तो यमराज लिये जा रहे थे। यमराज ने फिर कहा हे सावित्री,तुम सत्यवान् के प्राण छोडकर चाहे जो मांगना चाहो एक बार फिर मांग सकती हो , इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सदा सौभाग्यवती होने का वरदान मांगा। यमराज ने बिना विचारे प्रसन्न होकर तथास्तु बोल दिया। वचनबद्ध यमराज आगे बढ़ने लगे।

 

तब सावित्री ने कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता नारी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज सावित्री की चतुराई पर अचंभित रह गए अपने वरदान की लाज रखने के लिए अंततः उन्हें सत्यवान के प्राण वापस उसके मृत शरीर में छोड़ने पड़े। यमराज के ऐसा करते ही वटवृक्ष के नीचे लेटे सत्यवान के मृत शरीर में पुनः प्राण जाते ही वे जीवित हो गए और उनके अंधे माता पिता को पुनः अपनी आंखे और राज्य दोनों प्राप्त हो गया ! इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।

 

इसी कारण आज भी  वट सावित्री व्रत की पूजा में सौभाग्यवती स्त्रियाँ बरगद के वृक्ष की पूजा करके अपने लिए अपने पति की लम्बी आयु और सौभाग्यवती होने का वरदान मांगती हैं ! ऐसी मान्यता है कि वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से व्रत रखने वाली नारियों के वैवाहिक जीवन के सभी संकट टल जाते हैं।

 

 

 

 

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