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बलात्कार पीडिता का अन्तर्द्वन्द

दुष्कर्म की वारदातें अब चौंकाती नहीं क्योंकि मूल्य हीन भौतिकता, एकाकीपन, निजीकरण और न्यूक्लियर फैमिली जैसे विदेशी सिद्धांतों ने समाज को इतना दूषित कर दिया है कि यह घटनाएं अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है। उत्पादों के बढ़ते विज्ञापनों में नारी भोग्या रूप में स्थापित हो चुकी है और इंटरनेट और सोशल मीडिया की अनियंत्रित रफ्तार ने अपरिपक्व यानी नाबालिग मन को पूरी तरह प्रदूषित कर दिया है। बलात्कार अब एक मानसिकता बन चुकी है और यह मानसिकता सामने वाले को ज्यादा जख्म देने पर और ज्यादा प्रसन्नता देती है। नई पीढ़ी इंटरनेट एवं सोशल मीडिया से बच नहीं सकती किंतु उन्हें ही यह बीड़ा उठाना होगा कि वह बलात्कार के दुष्प्रभावों को समझ कर अपने समाज को एक स्वस्थ वातावरण प्रदान करें, ताकि उनका जीवन साथी उन पर पूरी तरह से विश्वास करे। क्योंकि पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं। पृथ्वी की कल्पना मनु और इरा से इतर नहीं की जा सकती।

हाथरस कांड से सरकार की ही छवि धूमिल नहीं हुई है, बल्कि मीडिया और राजनीतिक पार्टी की भी सच्चाई उजागर हुई है। गांव में जाने पर रोक लगाने की कार्रवाई से सरकार की चारों तरफ किरकिरी हो रही है, किंतु इंसाफ के नाम पर किसी बलात्कार को बिना असलियत जाने मुद्दा बनाना मीडिया कर्मियों और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों की विफलता को ही दर्शाता है। क्या संवेदनहीनता का परिचय केवल प्रशासन द्वारा दिया गया है या बलात्कार जैसे सेंसेटिव मुद्दे पर मीडिया, विपक्षी दल और विदेशी फंडिंग एजेंसियां मोदी और योगी के खिलाफ क्या एक षड्यंत्र  को मूर्तरूप  नहीं दे रही हैं? बलात्कार की घटना तो बारा राजस्थान में भी हुई और बलरामपुर उत्तर प्रदेश में भी हुई और जगहों पर भी, पर क्या हर स्थान पर बलात्कार ही हुआ या विभिन्न किस्मों का बलात्कार हुआ।

महिला का बलात्कार तो आजकल आम बात हो गई है, किंतु उसके बलात्कार के नाम पर मीडिया अपने स्वयं का बलात्कार या विपक्षी दल अपने स्वयं का बलात्कार कर जनता को गुमराह करने की एक असफल कोशिश कर रहे हैं। क्या यह मुद्दे गिरती टीआरपी या गिरते राजनीतिक भविष्य को एक दिशा दे सकते हैं- नहीं? यह मुद्दे समय के साथ धूमिल हो जाएंगे और जो वास्तविक घटना है उस पर पर्दा पड़ा रहेगा।

बलात्कार से जुड़े हर मामलों में पीड़िता को घटना की प्रताड़ना से गुजरने के बाद भी संवेदनहीन पुलिसकर्मियों, वकीलों और अधिकारियों के सामने न्याय में हुई देरी और मुआवज़े को लेकर अपमान का सामना करना पड़ता है। बलात्कार की शिकार एक लड़की के गाँव कनेक्शन से साक्षात्कार में कहे ये शब्द पूरे तंत्र का भयावह चेहरा दिखा देंगे। “शोषण दो तरीके से होता है। एक शारीरिक तो दूसरा मौखिक। एक तो हमारे साथ एक बार गलत हुआ, लेकिन वकील और पुलिस के लोगों के सामने बार-बार वहीं दोहराना पड़ता है। यह मौखिक शोषण है। दो साल से मेरा केस कोर्ट में चल रहा है, लेकिन इतने दिनों में न जाने कितनी बार वकीलों को बार-बार दोहराना पड़ा।”

बलात्कार जैसी घिनौनी और अमानवीय घटनाओं में लगातार वृद्धि नौजवानों में गिरती मानसिकता और “नारी भोग्या ही है” जैसी पुरुषवादी सोच को परिभाषित कर रहा है। पुरुष समाज आदिकाल से नारी को भोग्या मानता आ रहा है। यह पुरुष समाज किसी जनजाति या पिछड़ी जाति वालों को जाति सूचक शब्द कहने पर गैर जमानती गिरफ्तारी जैसी सजा सुनाता है किंतु बलात्कार होने पर “नारी भोग्या है” के सिद्धांत को ही प्रतिपादित करता है। बलात्कारी अदालत में भी अपने कर्म पर गर्व कर सकता है क्योंकि उसका वकील स्त्री को केवल भोग्या मानकर अश्लील सवालों से उसका चारित्रिक बलात्कार करता है जिससे उस महिला के पास सिवाय मृत्यु के और कोई चारा नहीं रह जाता। क्या स्त्री जनजाति या पिछड़ी जाति से भी निकृष्ट है? क्योंकि बलात्कारी के लिए गैर जमानती तो क्या गिरफ्तारी भी राजनीतिक पार्टी के नेताओं और स्थानीय जातियों के ऊपर निर्भर है। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों ना हो, अपराधी भयमुक्त होकर अपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। कानून व्यवस्था इतनी लचर है या फिर हमारे शिक्षा और संस्कार अमर्यादित हैं जिनके अभाव में नौजवान भटक रहा है।

बलात्कार पीड़िताओं की सहायता कर रहीं अर्चना सिंह लखनऊ के महिला कल्याण विभाग के आशा ज्योति केन्द्र की सोशल वर्कर हैं। वो बताती हैं, “जब पीड़िता बयान के लिए थाने पर जाती है, तो पुलिस के लोग, कोर्ट में वकीलों और जमा भीड़ के सामने उससे सवाल-जवाब किए जाते हैं। उसे बार-बार वही अपने साथ घटी घटना दोहरानी पड़ती है। इसके लिए अधिकारियों को संवेदनशील होना चाहिए,”। वह आगे बताती हैं, “बार-बार बलात्कार पीड़िता से यही पूछा जाता है-तुम सतर्क क्यों नहीं थीं?”

आज युवाओं की रुचि सिनेमा , क्रिकेट और राजनीति में बढ़ती का रही है। इन तीनों क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों की सम्पन्नता और प्रतिष्ठा सोच से परे है और यही लोग नई पीढ़ी के रोलमॉडल हैं जबकि वर्तमान में इनकी विश्वसनीयता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। मेरा दृढ़ विचार है कि जिस देश में युवा छात्रों का आदर्श सैनिक, वैज्ञानिक, शोधार्थी या शिक्षक आदि न होकर मीडिया या राजनैतिक दलों के सदस्य होंगे, उनकी स्वयं की आर्थिक उन्नति भले ही हो जाए, देश का विकास नहीं होगा। धीरे-धीरे देश में भ्रष्टाचारी, बलात्कारियों और देशद्रोहियों की संख्या ही बढ़ती रहेगी , ईमानदार लोग हाशिये पर चले जाएँगे, राष्ट्रवादी कठिन जीवन जीने को अभिशप्त होंगे। अगर गांधी जी या नेहरू जी ने स्वार्थपरक राजनीति की बजाय चरित्र को प्राथमिकता दी होती, जनता को वोट बैंक की बजाय कांग्रेस ने उनकी गरीबी और शिक्षा पर ध्यान दिया होता, तो आज़ादी के 73 सालों बाद आज बेरोजगारों की फ़ौज नहीं होती और इन खाली दिमागों में अपराध करने की प्रवृत्ति नहीं होती। अशिक्षित और बेरोजगार युवकों में कुछ ना कर पाने  की वेदना ही निर्बल पर अत्याचार के रूप में परिलक्षित होती है जिसकी परिणीति बलात्कार के बढ़ते मामलों के रूप में है।

देश के लगभग सभी हिस्सों से दुष्कर्म की घटनाएं सुनाई देती हैं। किंतु घटना का समाधान क्या हुआ यह सूचना कोई भी मीडिया हाउस नहीं बताता। लोगों में यह विश्वास पैठ कर चुका है कि बलात्कारियों और नेताओं को न्यायपालिका द्वारा भी सजा नहीं दी जा सकती। ऐसे में देश की आधी आबादी की सुरक्षा के लिए इन घटनाओं के पीछे की मानसिकता, नैतिकता और मनोविज्ञान को समझना जरूरी है। समाज मनोवैज्ञानिकों बताते हैं स्त्रियों के साथ दुष्कर्म की सबसे बड़ी वजह पुरुष वर्चस्ववादी सोच है जिसमें नारी भोग्या है यानी उपभोग की वस्तु। यह स्थिति एक मजहब, जाति, वर्ग और क्षेत्र तक सीमित नहीं है। एकल परिवार व्यवस्था होने से लोगों में सामाजिक दबाव और डर कम होने लगा और निजी स्वतंत्रता के नाम पर सोशल मीडिया पर या फिल्मों में इस मानसिकता को इस तरह दर्शाया गया कि लोग सोचने समझने की शक्ति ही खोने लगे और जो पर्दे पर दिखाया गया वही क्षणिक सुख पाने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाने लगा। सांस्कृतिक क्षरण की यह चुनौती एक सोची-समझी चाल है जोकि विरासत में मिले हिंदुत्ववादी सिद्धांत “नारी देवी है” को नष्ट करना चाहती है। विभिन्न चैनलों पर प्राइम टाइम में होने वाली चर्चाएं केवल नेताओं के व्यक्तित्व, वक्तव्य या फिल्मी कलाकारों के चारित्रिक पतन के बीच में ही सिमट कर रह गई हैं। इन चर्चाओं में कभी भी बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी ने भी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक या शैक्षिक दृष्टिकोण से नौजवानों को समझाने की कोशिश नहीं की गई कि नारी भोग्या नहीं है। सरकारी योजनाओं मे आजकल बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना और  सुकन्या योजना को बढ़ावा दिया जा रहा है किंतु हमारे नेता ही अपने दलों में आधी आबादी के पक्ष में नहीं। जब तक आधी आबादी को उसका मनोबल बढ़ाकर उसे राष्ट्र के विकास की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जाएगा या राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका को नहीं समझा जाएगा, तब तक पुरुषवादी सोच राष्ट्र का विकास तो कर सकती है किंतु राष्ट्र का चरित्र निर्माण नहीं कर सकती। अगली पीढ़ी के शैक्षिक, नैतिक और चारित्रिक निर्माण के लिए आधी आबादी का ‘जिंदा’ रहना आवश्यक है। पुरुषवादी सोच तकनीकी विकास को बढ़ावा दे सकती है, देश की रक्षा कर सकती है, किंतु पुरुषवादी सोच किसी को नवजीवन नहीं दे सकती। यह वरदान तो सिर्फ स्त्रियों में ही है। इसलिए मूल्यपरक शिक्षा की जरूरत आधी आबादी से ज्यादा राजनीतिक दलों, मीडिया कर्मियों, फिल्मकारों और भटकते नौजवानों के लिए अति आवश्यक है।

हाथरस में जो हो रहा है वह वास्तविकता में समस्या का समाधान करने के बजाय सिर्फ स्वार्थ सिद्धि के लिए गुमराह करने वाली राजनीति को परिभाषित कर रहा है।  भारतीय संस्कृति विश्व बंधुत्व का शंखनाद करती है किंतु हम राष्ट्र के भीतर ही बंटे लगते हैं। हमें अगर बलात्कार जैसे मुद्दों पर बात करनी है तो हमें खुल कर बोलना होगा कि हम स्त्रीयों का भी एक दृष्टिकोण है। हमारी हां या ना का मतलब भी पुरुषवादी सोच के बराबर है। अगर हमें लड़ना पड़े तो भी इस मुद्दे पर पुरुषों को आगे करके राजनैतिक फल खाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। बलात्कार हमारी समस्या है पुरुषों की नहीं। इसलिए हमें बलात्कार पर खुल कर बोलना होगा। बलात्कार का मतलब शारीरिक शोषण ही नहीं होता बल्कि मानसिक शोषण भी होता है। किंतु समाज सवाल केवल स्त्री से ही करता है। बलात्कारी तो अपनी जिंदगी सामान्य ढंग से बुढ़ापे तक जी सकता है क्योंकि समाज उसे कुछ नहीं कहेगा। किंतु वही समाज शोषित स्त्री को तानो से 1 साल भी जिंदा रहने की अनुमति नहीं देता। वो सजा पाए अपराधियों की तरह इधर से उधर भागती है जैसे की घटना में उसकी ही संलिप्तता हो। स्त्रियों को मानसिकता बदलनी होगी कि वह भोग्या नहीं। उसके सजने संवरने से, उसके पहनावे से या उसके मुस्कुराने से बलात्कार नहीं होता, बुरी मानसिकता तो उस पुरुष की है। किसी पुरुष के स्पर्श मात्र से ही मेरा शरीर मैला नहीं हो सकता। मानसिकता पुरुष की गलत है तो सजा स्त्री को क्यों? हमारी लड़ाई हम स्वयं लड़ेंगे। राजनीतिक दलों या मीडिया हाउसों को इसमें दखलंदाजी नहीं देनी चाहिए। आधी आबादी के अधिकार संविधान भी उन्हें देता है। जातिगत आरक्षण सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करता है, उसी तरह बलात्कार पुरुष और स्त्री के बीच के संबंध को नष्ट करता है। आभासी दुनिया यानी सोशल मीडिया की तुलना में वास्तविक दुनिया के हमारे विचारों में बहुत अंतर है। लोग सोशल मीडिया में मदर्स डे, डॉटर्स डे और बेटियां बराबर अधिकारी हैं, जैसी पोस्ट डालते रहते हैं किंतु वास्तविक जीवन में यही लोग नारी से उसका अधिकार छीन लेते हैं। मेरी बेटी परी और दूसरे की बेटी भोग्या, इस मानसिकता को बदलना है। स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है, इस कहावत को बदलना है। हम वास्तव में बलात्कार जैसी घटना को समाप्त करना चाहते हैं तो दोहरे चरित्र से बाहर आकर हमें आत्मचिंतन करना होगा। बचपन से ही हमें चरित्र निर्माण और नैतिक शिक्षा, अहिंसा-शांति बनाए रखने का पाठ पढ़ाया गया है। लेकिन जब तक हमारे अंदर आत्म चेतना जागृत नहीं होती, तब तक कोई भी पुस्तक या अध्यापक हमें यह नहीं समझा सकता कि क्या ग़लत है और क्या सही।

बहरहाल, जितनी वीभत्स हैदराबाद की घटना रही, उससे अधिक शर्मनाक तेलंगाना के गृह मंत्री मोहम्मद महमूद अली का बयान माना गया। घटना के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘अफसोस की बात है कि “वो डॉक्टर पढ़ी-लिखी होने के बाद भी अपनी बहन को फोन किया, अगर वो 100 नंबर पर कॉल करती तो बच जाती।” यहां राजनेताओं की संवेदनहीनता का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि वे हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारे लिए नीति निर्माण का कार्य करते हैं।

अगर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर उनकी ही सोच दूषित होगी, तो नारी समाज किससे सुरक्षा और न्याय की आस लगाएगा। संसद में बैठकर बलात्कार के खिलाफ नीति-निर्माता ही जब बलात्कारियों के प्रति सहानुभूति और लचीला रवैया रखें और महिलाओं के प्रति विकृत सोच रखें तो महिलाओं के खिलाफ अपराध का आंकड़ा बढ़ने पर आश्चर्य कैसा! महिलाओं के कपड़ों को ही बलात्कार का कारण ठहराने वाले खट्टर जैसी सोच के नेता संसद और विधायिका में भी जनता द्वारा है चुं कर जाते हैं।

नेता पुलिस और अपराधी की गठजोड़ पर एन एन वोहरा समिति ने बहुत पहले अपनी रिपोर्ट दी थी किंतु राजनीतिक दबाव के कारण उनकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। दलों के निहित स्वार्थ के कारण अपराधी तत्वों को उचित दंड देकर नारी से दूर रखने की कोई संभावना आज दिखाई नहीं देती, हऐसे में अब न्यायपालिका पर ही आश्रित है देश। समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना चाहिए और अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बलात्कारियों के लिए दंड संहिता में कड़ा प्रावधान करना चाहिए। बलात्कारियों के लिए आईपीसी की जघन्य धाराएं निर्धारित की जाए। बलात्कार को भी दुर्लभतम की श्रेणी में रखते हुए बलात्कारी को फांसी की सजा का प्रावधान रखा जाए। क्योंकि पीड़ित महिला कभी भी अपनी पुरानी जिंदगी में नहीं लौट सकती, क्योंकि समाज उसे बहिष्कृत कर देता है, क्योंकि वह निकृष्ट हो जाती है, क्योंकि उसका शरीर अब मैला हो गया है! क्या घटना को अंजाम देने वाला उसकी जिंदगी उसे लौटा सकता है? नहीं।

तो फिर बलात्कारी को सामान्य जिंदगी जीने के लिए कैसे छोड़ा जा सकता है। केवल इस वजह से कि समाज पुरुषवादी सोच रखता है इसलिए बलात्कारी को यह करने की छूट है, इस मानसिकता से बाहर निकालना होगा। प्रजातंत्र का आधार ही निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायपालिका है।

हमें सामाजिक और मानसिक स्वतन्त्रता लानी होगी। एक संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा वरना आने वाली मानसिक रोगी पीढियाँ यूँ ही बलात्कार के बाद पीड़ित की हत्या कर के शरीर पेड़ से लटकाती रहेंगी। पैदा हुई बेटी बन कर, पितृसत्तात्मक विचारधारा में पली, बहन बनी तो भाई की छत्रछाया, पत्नी बनी तो पुरुषवादी विचारधारा और मां हूं तो बेटे की लाठी चाहिए। मैं कहां हूं? व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहां है, मेरी भावनाएं क्यों नहीं समझते? सोच बदलेगी तभी तस्वीर बदलेगी। पुरुषवादी सोच नहीं, महिलाओं की सोच। अपने को कम आंकने की मानसिकता। बिना गलती के सजा झेलने की मानसिकता और सबसे बड़ी त्याग की मानसिकता।

“त्रेता द्वापर की बात नहीं, कलयुग भी शर्मिंदा है,

भरतभूमि के घर घर में दुशासन अब भी जिंदा है।

विवश हुआ कानून, पांडव वाकयुद्ध में रत हैं,

भरी अदालत में दुशासन, वस्त्रहरण को दृढ़प्रतिज्ञ है।

अंतर्द्वंद छोड़ मुझे अब स्वयं उत्तर  बनना होगा,

कलयुग में पांचली को स्वयं गिरधर बनना होगा।”

डॉ ऋतु  श्रीवास्तव

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