ग्रामीणआजीविका मिशन के अंतर्गत समूह से जुड़ी महिलाएं जमुनापारी बकरी की संरक्षण एवं संवर्धन करेंगी

अंकुर त्रिपाठी IBN NEWS  जिला संवाददाता

इटावा जिला इटावा में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत समूह से जुड़ी महिलाएं जमुनापारी बकरी की संरक्षण एवं संवर्धन करेंगी।
जिलाधिकारी जे.बी.सिंह के निर्देशन में मनरेगा योजना के अंतर्गत जनपद के विकास खंड चकरनगर के ग्राम पंचायत सिण्डौस और बढ़पुरा के गाती और मेहुली गांव में बकरी पालन फार्म तैयार की जा रही है।प्रत्येक फार्म हेतु 35 से 40 लाख रुपए तक लागत आएगी।पूर्व से बने प्रजनन केंद्र चांदई का जीर्णोद्धार भी किया जा रहा है।इससे पशु पालक को उचित मूल्य प्राप्त हो सकेगी एवं इस प्रजाति का संरक्षण व संवर्धन योजना के तहत किया जा सकेगा।


मुख्य विकास अधिकारी डॉ. राजा गणपति आर. की संकल्पना के अनुसार इसे बढ़ावा देने के लिए पशुपालन विभाग से समन्वय स्थापित कर समय पर उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।किसी भी अकल्पनीय नुकसान से बचने के लिए बकरी का बीमा कराया जाएगा।इटावा जिले में पाई जाने वाली जमुनापारी नस्ल अन्य की तुलना में सबसे ऊंची और लंबी होती है।यह ज्यादा दूध देने के लिए भी प्रसिद्ध है।यह नस्ल उत्तर प्रदेश के जनपद इटावा में गंगा, जमुना,चंबल नदियों से घिरे क्षेत्र में ज्यादा पाई जाती है।इनसे दूध और मांस दोनों ही अच्छा मिलता है।इनके मेमना भी अच्छी कीमत पर लोग खरीद लेते हैं।कम लागत लगाकर भी किसान इसको पाल सकता है।बकरियां जंगलों की पत्तियां खाती है।इसलिए दाना भी कम देना पड़ता है।इटावा जिले में बहुत लोग इस नस्ल की बकरी को पाल रहे हैं।

बृज मोहन अम्बेड,उपायुक्त स्वतः रोजगार ने बताया कि इन्हें रखने के लिए चार हिस्सों में बांटा जाएगा।पहली में स्वस्थ बकरा, दूसरे पर स्वस्थ बकरी,तीसरे में गर्भवती बकरी और चौथे में बकरी के मेमनों को अलग अलग रखा जाएगा।इनकी देख-रेख समूह की महिलाए करेंगी।इन सेडों का निर्माण उभरते व्यापार केंद्र के रूप में भी विकसित किया जाएगा।जिससे दूरस्थ व्यापारी एक ही स्थान से बकरी खरीद सके।इससे क्षेत्र में न केवल जमुना पारी बकरी का संरक्षण एवं संवर्धन होगा,बल्कि मिशन की लक्षित परिवार की महिलाएं लाभान्वित होंगी।

जिला मिशन प्रबंधक दीपेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि कम होती खेती और गाय-भैंसों में होने वाले ज्यादा खर्च के कारण लोगों का रुझान बकरी जैसे छोटे पशुओं के पालन की तरफ बढ़ा है।ऐसे में बकरी की जमुनापारी नस्लों से पशुपालक अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।इनके बकरी 2 साल में सामान्य बकरियों से ज्यादा वजन के हो जाते हैं।इनके ज्यादा वजन के कारण ही इनकी कीमत अच्छी मिलती है।

जिला मिशन प्रबन्धक नन्दकिशोर साह ने बताया कि इस बकरी के खाने का ज्यादा खर्चा नहीं होता है।इनको जंगलों में चराकर पाला जा सकता है।इनकी ब्रीडिंग भी अच्छी होती है।यह अपने जीवन काल में 13 से 15 बच्चे दे देती है।नर का औसत वजन 70 से 90 किलो ग्राम और मादा का वजन 50 से 60 किलोग्राम होता है। जमुनापारी नस्ल के बारे में जान कारी देते हुए पशु विशेषज्ञ ने बताया कि यह भारतीय उप महाद्वीप की उत्पन्न होने वाली बकरी की एक नस्ल है।1953 के बाद से इन्हें इंडोनेशिया में निर्यात किया गया है,जहां उन्हें एक बड़ी सफलता मिली है।यह अमेरिकी न्यूबियन के पूर्वजों में से एक है। जमुनापारी बकरी किसान किसी भी परिस्थिति में पाल सकता है। इसके प्रबंधन में कोई ज्यादा खर्च नहीं आता है।इस नस्ल की बकरी का दूध मेडीसिन के लिए प्रयोग किया जाता है।इसलिए इनके दूध की कीमत अच्छी मिल जाती है। इनके दूध में मिनरल और सॉल्ट की मात्रा अधिक होती है।अगर कोई किसान इस नस्ल को पालना चाहता है तो वह मथुरा के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण ले सकता है।
इस कार्य में ब्लॉक मिशन प्रबंधक बृजराज,कृष्ण कान्त चौधरी, सहायक विकास अधिकारी अखिलेश यादव,संतोष कुमार का सराहनीय सहयोग मिल रहा है।

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